पढ़िए महाभारत के रचियता महर्षि वेदव्यास के जन्म की अदभुत कहानी …..

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विश्व के पहले पुराण, विष्णु पुराण की रचना करने वाले महर्षि पराशर एक बार यमुना नदी के किनारे भ्रमण के लिए निकले। भ्रमण करते हुए उनकी नजर एक सुंदर स्त्री सत्यवती पर पड़ी। मछुआरे की पुत्री सत्यवती, दिखने में तो बेहद आकर्षक थी लेकिन उसकी देह से हमेशा मछली की गंध आती थी, जिसकी वजह से सत्यवती को मत्स्यगंधा भी कहा जाता था।

वेदव्यास जी की जीवनी ,गज़ब दुनिया

महर्षि पराशर, सत्यवती के प्रति आकर्षित हुए बिना रह नहीं पाए। उन्होंने सत्यवती से उन्होंने नदी पार करवाने की गुजारिश की। सत्यवती ने उन्हें अपनी नाव में बैठने के लिए आमंत्रित किया। नाव में बैठने के बाद पराशर ऋषि ने सत्यवती के सामने प्रणय निवेदन किया, जिसे सत्यवती ने सशर्त स्वीकार किया। पराशर ऋषि, सत्यवती के साथ संभोग करना चाहते थे, जिसकी स्वीकृति देने से पहले सत्यवती ने उनके सामने अपनी तीन शर्तें रखीं।

वेदव्यास जी की जीवनी ,गज़ब दुनिया

1. सत्यवती की पहली शर्त थी कि उन्हें संभोग करते हुए कोई भी जीव ना देख पाए। पराशर ने इस शर्त को स्वीकार करते हुए अपनी दैवीय शक्ति से एक द्वीप का निर्माण किया जहां घना कोहरा था। इस कोहरे के भीतर कोई भी उन्हें नहीं देख सकता था।

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2. सत्यवती की दूसरी शर्त थी कि उसके शरीर से आने वाली मछली की महक के स्थान पर फूलों की सुगंध आए। पराशर ने ‘तथास्तु’ कहकर यह शर्त भी स्वीकार कर ली और सत्यवती के शरीर में से आने वाली मछली की गंध समाप्त हो गई। इसके विपरीत उसकी देह फूलों की तरह महकने लगी।

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3. तीसरी शर्त के रूप में सत्यवती ने कहा कि सहवास के बाद जब वह गर्भ धारण करेगी तो उसका पुत्र कोई सामान्य व्यक्ति नहीं बल्कि महाज्ञानी होना चाहिए, ना कि एक मछुआरा। सत्यवती की यह शर्त भी पराशर ऋषि द्वारा मान ली गई। साथ ही पराशर ऋषि ने यह भी वरदान दिया कि सहवास के बाद भी उनका कौमार्य कायम रहेगा।

सत्यवती और ऋषि पराशर ने कोहरे से भरे द्वीप पर संभोग किया। समय आने पर सत्यवती ने एक पुत्र को जन्म दिया, जो जन्म के साथ ही महाज्ञानी था। सत्यवती और पराशर की संतान का रंग काला था, जिसकी वजह से उसका नाम कृष्ण रखा गया। यही कृष्ण आगे चलकर वेद व्यास के नाम से प्रसिद्ध हुए।

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कृष्ण जब बड़े हुए तब उन्होंने अपनी मां से कहा कि जब भी वह किसी विपत्ति की समय उन्हें याद करेंगी, वह उपस्थित हो जाएंगे। इतना कह कर वे तपस्या करने के लिये द्वैपायन द्वीप चले गये। द्वैपायन द्वीप में तपस्या करने तथा उनके शरीर का रंग काला होने के कारण उन्हे कृष्ण द्वैपायन कहा जाने लगा। आगे चल कर वेदों का भाष्य करने के कारण वे वेदव्यास के नाम से विख्यात हुये।

वेदव्यास महाभारत ग्रंथ के रचयिता थे। वेदव्यास महाभारत के रचयिता ही नहीं, बल्कि उन घटनाओं के साक्षी भी रहे हैं, जो क्रमानुसार घटित हुई हैं। अपने आश्रम से हस्तिनापुर की समस्त गतिविधियों की सूचना उन तक तो पहुंचती थी। वे उन घटनाओं पर अपना परामर्श भी देते थे। जब-जब अंतर्द्वंद्व और संकट की स्थिति आती थी, माता सत्यवती उनसे विचार-विमर्श के लिए कभी आश्रम पहुंचती, तो कभी हस्तिनापुर के राजभवन में आमंत्रित करती थी।

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प्रत्येक द्वापर युग में विष्णु व्यास के रूप में अवतरित होकर वेदों के विभाग प्रस्तुत करते हैं। पहले द्वापर में स्वयं ब्रह्मा वेदव्यास हुए, दूसरे में प्रजापति, तीसरे द्वापर में शुक्राचार्य, चौथे में बृहस्पति वेदव्यास हुए। इसी प्रकार सूर्य, मृत्यु, इन्द्र, धनजंय, कृष्ण द्वैपायन अश्वत्थामा आदि अट्ठाईस वेदव्यास हुए। इस प्रकार अट्ठाईस बार वेदों का विभाजन किया गया। उन्होने ही अट्ठारह पुराणों की भी रचना की, ऐसा माना जाता है। वेदव्यास यह व्यास मुनि तथा पाराशर इत्यादि नामों से भी जाने जाते है। वह पराशर मुनि के पुत्र थे, अत: व्यास ‘पाराशर’ नाम से भी जाने जाते है।

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