नक्सलियों से घिरा है यह मंदिर, ठोस सोने की है मूर्ति, किमत है 2500 करोड

भारत को लोग सोने की चिडिया के नाम से जानते थे। कहा जाता था की भारत में अकुत सोने के भण्डार थे। इन्हीं सोने के भण्डार के कारण भारत पर पिछली कई सदियों से आक्रमण होते रहे है। शक, हुण, कुषाण, मुस्लिम और अग्रेंज इन्हीं वैभवता को देखकर भारत की और खिंचे चले आये थें। उन्होनें हजारों साल तक भारत को लुटा और यहॉं का धन बाहर ले गये। सोमनाथ मंदिर इसके कई उदाहरणों में से एक है। लेकिन इतना लूट कर ले जाने के बाद भी आज भारत के मंदिरों की वैभवता में कोई कमी नहीं आई है। आज भी भारत के कई मंदिरो में बहुत धन सम्पदा है। इसी कडी में आज हम आपको बताने जा रहें है एक एसे मन्दिर के बारे में जिसकी मूर्ति की किमत बहुमुल्य है।

नक्सलियों से घिरा है यह मंदिर, ठोस सोने की है मूर्ति
झारखण्ड राज्य के उत्तर पश्चिम में स्थित है गढवा जिला। गढवा जिले के नगरउॅटारी में स्थित है बंशीधर मंदिर है। यह एक नक्सल प्रभावित इलाका है। मंदिर में वर्षों पुरानी भगवान श्रीकृष्ण की 4.5 फिट उॅची सोने की मुर्ति है। बताया जाता है कि यह मूर्ति 1400 किलो सोने से बनी है। और मूर्ति की किमत 2500 करोड रू से अधिक ऑकी गई है।

बंशीधर मंदिर

भगवान ने दिये थे सपने में दर्शन, बतायी थी मूर्ति की जगह
मंदिर के लेखों और वहॉ के प्रथम पुजारी सिद्धेश्वर तिवारी ने अपनी किताब में बताया है कि विक्रम सम्वत 1885 में वहां महाराज भवानी सिंह का शासन था और उनकी अकाल मृत्यु हो चुकी थी। महाराज की विधवा महारानी शिवमानी कुंवर भगवान कृष्ण की भक्ति में लीन रहती थी। श्री कृष्ण जन्माष्टमी की रात उन्हें सपने में भगवान कृष्ण ने दर्शन दिये और कहा कि कनहर नदी के किनारे शिवपूरी पहाडी में उनकी प्रतिमा गडी हुई है। भगवान कृष्ण ने वह मुर्ति राजधानी में लाने और पुर्नस्थापना की भी बात सपने में कही। अगले ही दिन महारानी अपने सैनिको के साथ स्वयं पहाडी पर गई और सपने में बताई जगह पर खुदाई करवाई । सपने की बात सत्य सिद्ध हुई और उन्हें उसी स्थान पर भगवान कृष्ण की अलौकिक मुर्ति मिली।

हाथी की वजह से गढ के बाहर स्थापित हुआ ये मंदिर
मुर्ति बहुत ही भारी थी इसलिये मुर्ति को हाथियों पर रखकर नगर उंटारी लाया गया। महारानी शिवमानी मुर्ति की स्थापना अपने गढ के अन्दर करना चाहती थी । लेकिन जिस हाथी पर वह मुर्ति लायी गयी थी वह गढ के मुख्य द्वार पर ही बैठ गया और बहुत प्रयास के बाद भी वह वहां से नहीं हटा। अन्ततः महारानी ने भगवान की इच्छा मानकर वहीं पर मूर्ति की स्थापना कर मंदिर का निर्माण करवाया।

हाथी की वजह से गढ के बाहर स्थापित हुआ ये मंदिर

राधा जी की मुर्ति बाद में लायी गयी
बताया जाता है कि महारानी शिवमानी को जो मुर्ति शिवपुरी की पहाडी में मिली वो केवल भगवान श्रीकृष्ण की ही थी। बाद में वाराणासी से राधा रानी की अष्टधातु की मूर्ति बनवाकर मंगवायी गयी। और पुरे रिती रिवाजों के साथ राधा रानी की मुर्ति की स्थापना भगवान श्रीकृष्ण के साथ की गई।

राधा जी की मुर्ति बाद में लायी गयी

मराठों से भी जुडा हुआ है मुर्ति का इतिहास
इतिहासकारों का यह मानना है कि भगावान श्रीकृष्ण की इस मूर्ति का निर्माण उस समय के मराठा शासकों ने करवाया था। मुगलो ने उस समय भारत पर आक्रमण किया था। मुगलो का मूल उद्देश्य मंदिरो को लुटना भी था। मुगलों से बचाने के लिये ही मराठाओं ने मूर्ति को शिवपूरी की पहाडियों में एक गुफा में छुपा दिया था। कालान्तर में वही मूर्ति महारानी शिवमानी देवी को मिली थी।

कई बार की जा चुकी है इस बहुमुल्य मूर्ति को चुराने की कोशीश
1930 की एक घटना है जब चोर भगवान की मूर्ति से बॉसुरी और छत्र चुरा कर ले गये थे। चोर तो पकडे गये लेकिन भगवान के बॉसुरी और छत्र नहीं मिल पाये थे। तब वहां के राजा ने सोने की बॉसुरी और छत्र मंदिर में लगवाये थे। अभी सन 2015 में भी एक व्यक्ति छोटू खहरवार को मूर्ति चुराने की साजिश करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।

मूर्ति की छवि बहुत ही मनभावन है और वर्षा पुराने इस मंदिर की मान्यता भी चारों तरफ है। लोग दूर दूर से भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन के लिये आते है। तो आप भी एक बार जरूर जाकर आये इस अद्भूत मूर्ति के दर्शन करने।