श्री मुंडेश्वरी चमत्कारी मंदिर जहां बिना खून बहाये चढायी जाती है बलि

0
121

हमारे देश में तरह-तरह की परम्पराएं प्रचलन में रही हैं। इन्हीं परम्पराओं में एक परम्परा देवी को बलि चढ़ाया जाना है। आमतौर पर देवी को बलि चढाने की परम्परा देश के कम ही मंदिरों में हैं, लेकिन कई मंदिर ऐसे भी हैं जो बलि की अपनी अनूठी परम्परा का सदियों से पालन करते चले आ रहे हैं। इन्ही मंदिर में एक मंदिर बिहार के भभुआ में स्थित श्री मुंडेश्वरी मंदिर भी है। आइए जानते हैं कि 2000 साल से भी ज्यादा पुराने इस मंदिर में आखिर क्या खास है।

प्रसिद्ध मुंडेश्वरी मंदिर
बिहार के मुंडेश्वरी मंदिर को दुनिया के सबसे पुराने मंदिरों में एक माना जाता है। शक्ति को समर्पित यह मंदिर बिहार के कैमूर जिले में 608 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण दूसरी शताब्दी में हुआ था, लेकिन इसके निर्माण को लेकर कई अलग-अलग धारणाएं हैं। मंदिर में लगे भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के एक सूचनापट्ट के अनुसार, यह मंदिर 635 ईसवी में बना था।

मुंडेश्वरी मंदिर पहुँचने का रास्ताकई प्रसिद्द शहरों जैसे पटना, गया और वाराणसी से सड़क मार्ग द्वारा आराम से मुंडेश्वरी मंदिर पहुँचा जा सकता है। मंदिर का सबसे नज़दीकी रेलवे स्टेशन है भबुआ रोड रेलवे स्टेशन, जो मंदिर से लगभग 22 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। आप पूरे साल कभी भी मंदिर के दर्शन को आ सकते हैं।

मंदिर में बलि चढ़ाने की परंपरा
नवरात्र के दौरान मुंडेश्वरी मंदिर में बलि चढ़ाने की परंपरा है। देवी मां से मांगी गई मन्नत जब पूरी हो जाती है तो भक्त यहां बकरे की बलि देते हैं। खास बात यह है कि बिना बकरे की जान लिए और बिना खून बहाए ही यहां बलि दी जाती है। परंपरा के अनुसार मंदिर के पुजारी बलि के बकरे को देवी मां की प्रतिमा के सामने खड़ा कर देते हैं। देवी मां के चरणों में चावल अर्पण कर उसी चावल को बलि के उस बकरे पर फेंकते हैं। चावल फेंकने के बाद बकरा बेहोश हो जाता है। बकरा जब होश में आता है तो उसे खुला छोड दिया जाता हैं। यहां बलि देने की यह परंपरा सालों से चली आ रही है। मंदिर में नवरात्र के समय बहुत भीड़ होती है।

मंदिर से जुडी पौराणिक मान्यतामान्यताओं के अनुसार चंड व मुंड नामक दैत्यों को मारने के लिए देवी प्रकट हुईं थीं। चंड के मरने पर मुंड इसी पहाड़ी में छिप गया था और यहीं पर माता ने उसका वध किया था। इसीलिए यह मंदिर मुंडेश्वरी माता के नाम से जाना जाता है। चीनी यात्री ह्वेनसांग 636-38 के यात्रा विवरण में लिखा है कि पाटलिपुत्र से 200 किलोमीटर दूर दक्षिण-पश्चिम दिशा में एक चमत्कारपूर्ण देव स्थान है, जिसके शिखर से दिव्य ज्योति निकलती है।

मुंडेश्वरी मंदिर की वास्तुशैली
मंदिर को नागर शैली के नागरशैली के मुताबिक अष्टकोणीय आकर में बनाया गया है। मंदिर के चार कोनों में दरवाज़े और खिड़कियां बनी हुई हैं और चार दीवारों पर छोटे इंचो की मूर्तियां बनी हुई हैं। मंदिर का शिखर ध्वस्त कर दिया गया था, जिसके फलस्वरूप मरम्मत के दौरान इसे छत के रूप में फिर से बनाया गया। मंदिर की दीवारों में समृद्ध नक्काशियां और सजावट की गई हैं। मंदिर के प्रवेश द्वार में गंगा, यमुना और अन्य देवी देवताओं की मूर्तियां खोद कर बनाई गई हैं। यहाँ स्थापित देवी मुंडेश्वरी के दस हाथ हैं जिनमें उन्होंने शक्ति के 10 प्रतीकों को थामा हुआ है और माँ भैंस पर सवार हैं।