आ ही जाता वो राह पर ‘ग़ालिब’ कोई दिन और भी जिए होते आए है बेकसी-ए-इश्क़ पे रोना ‘ग़ालिब’ किस के घर जाएगा सैलाब-ए-बला मेरे बअ’द आईना देख अपना सा मुँह ले के रह गए साहब को दिल न देने पे...