2 कंपनियों और करोड़ो रुपये की मालकिन, अपने बिज़नस के साथ साथ पढ़ा रही हैं स्लम में रहने वाले 5000 गरीब बच्चों को

राजस्थान के जयपुर शहर में चल रहे ‘प्रथम शिक्षा’ की संस्थापक और ट्रस्टी सुमिति मित्तल ना सिर्फ बच्चों के लिये, बल्कि स्लम में रहने वाली लड़कियों को भी आत्मनिर्भर बनाने का काम कर रही हैं। यही वजह है कि आज उनकी मदद से दो सौ से ज्यादा लड़कियां विभिन्न अस्पतालों में नर्सिंग का काम कर रही हैं।

उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी, लेकिन आज वो सॉफ्टवेयर और रोबोटिक से जुड़ी दो कंपनियों की मालकिन हैं, उन्होने कभी राजस्थान पब्लिक सर्विस कमीशन की परीक्षा पास कर जल निगम में सहायक इंजीनियर के पद पर काम किया था, लेकिन आज वो अपने कारोबार के साथ-साथ स्लम में रहने वाले बच्चों को पढ़ाने और उनको वोकेशनल ट्रेनिंग देने का काम कर रही हैं।

राजस्थान के बीकानेर शहर की रहने वाली सुमिति मित्तल पेशे से एक सिविल इंजीनियर हैं। उनकी स्कूली शिक्षा बीकानेर में हुई लेकिन इंजीनियरिंग की पढाई के लिए वो जोधपुर आ गई। साल 1996 में इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने करने के बाद उन्होंने राजस्थान पब्लिक सर्विस कमीशन परीक्षा उत्तीर्ण की और उनका चयन जल विभाग में सहायक इंजीनियर के पद पर हुआ।

सुमिति के पिता अक्सर उनसे कहते थे कि शिक्षा ही वह औजार है जिससे कोई भी इंसान दुनिया बदल सकता है। इसलिये सुमिति इंजीनियर बनने के बाद कुछ नया करना चाहती थीं। इस वजह से उन्होने करीब 2 साल तक इंजीनियरिंग की नौकरी करने के बाद उसे छोड़ दिया और खुद कोई कारोबार शुरू करने का फैसला किया। इसके बाद उन्होने खुद की कंपनी ‘प्रथम सॉफ्टवेयर’ स्थापित की। अपने काम के सिलसिले में उन्हें अक्सर अमेरिका और दूसरे यूरोपीय देशों में जाना पड़ता था। वहां उन्होंने देखा कि हर बच्चा स्कूल जाता है और पढ़ता है।

सुमिति बताती हैं कि विदेशों में पढ़ाई को लेकर बच्चों के रूझान को देखकर मेरे मन में ख्याल आया कि हम अपने देश में भ्रष्टाचार की बात करते हैं, लेकिन शिक्षा की तरफ कोई ध्यान नहीं देता। इस कारण हमारे समाज में इतनी असमानता है। तब मैंने हर बच्चे तक शिक्षा पहुंचाने के उद्देश्य से ‘प्रथम शिक्षा’ की स्थापना साल 2005 में की।

सुमिति मित्तल ‘प्रथम शिक्षा’ की संस्थापक और ट्रस्टी है और पिछले 11 सालो से इसको चला रही हैं। ‘प्रथम शिक्षा’ जयपुर के स्लम इलाकों में रहने वाले गरीब बच्चों को मुफ्त मे बुनियादी शिक्षा देने का काम करता है। सुमिति ने बच्चों को पढ़ाने की शुरूआत अपने घर के गैराज से की। उन्होने स्लम में रहने वाले 20 बच्चों को श्यामनगर इलाके में पढ़ाना शुरू किया। हालांकि इस दौरान उनको कई परेशानियों का सामना करना पड़ा।

वो बताती हैं कि जो 20 बच्चे मेरे पास पढ़ने के लिए आते थे वो 3-4 साल के थे, क्योंकि इन बच्चों के माता-पिता इनको काम पर नहीं भेज सकते थे। जब मैंने बड़े बच्चों को भी स्कूल भेजने के लिए कहा तो उन्होने मना कर दिया। तब स्लम में रहने वाले लोगों को मनाने में मुझे काफी मेहनत करनी पड़ी।

इस दौरान सुमिति ने स्लम में रहने वाले लोगों से कहा कि अगर उनके बच्चे पढ़ लिख जायेंगे तो वो अपना नाम लिखना और पैसे का हिसाब किताब रखना सीख जायेंगे। साथ ही उन्होने लोगों से कहा कि वो अपने बच्चों को दिन में किसी भी वक्त एक घंटे के लिये उनके पास पढ़ने के लिये भेजें। ये बात बच्चों के माता पिता को भी ठीक लगी और वो अपने बच्चों को उनके पास पढ़ने के लिये भेजने लगे। आज करीब 350 बच्चों को वो पढ़ाने का काम कर रही हैं।

‘प्रथम स्कूल’ नर्सरी से 5वीं क्लास तक चलता है और हर क्लास में 20 बच्चों पर एक टीचर है। उनके स्कूल में 5वीं क्लास के काफी बच्चे स्कूल छोड़ कर काम पर चले जाते हैं। तब ऐसे बच्चों के लिए उनके बताये समय पर क्लास लगाई जाती है ताकि वो अपने काम धंधे के साथ पढ़ाई भी कर सकें। इस तरह जो बच्चे बीच में पढ़ाई छोड़ देते हैं वो यहां दिन के किसी भी वक्त एक घंटा पढ़ने के लिये आते हैं जिसके बाद इन बच्चों को ओपन स्कूल के जरिये 10वीं की परीक्षा राजस्थान बोर्ड से दिलाई जाती है। इन बच्चों की कक्षाएं शाम के 5 बजे तक चलतीं हैं।

‘प्रथम शिक्षा’ में आने वाले बच्चों में ज्यादातर लड़कियां हैं क्योंकि सुमिति का मानना है कि लड़कियों को आज भी शिक्षा के कम मौके मिलते हैं। इस कारण वो लड़कियों की शिक्षा पर ज्यादा ध्यान देती हैं। ‘प्रथम स्कूल’ का नियमित स्कूल सुबह साढ़े सात बजे से दोपहर 3 बजे तक चलता है। इस स्कूल की खास बात ये है कि यहां पर पहली क्लास से ही बच्चों को कम्प्यूटर शिक्षा दी जाती है। साथ ही ये बच्चों को खेलकूद, ड्राइंग और क्राफ्ट की एक्टिविटी भी कराते हैं। ताकि बच्चों में आत्मविश्वास पैदा किया जा सके।

‘प्रथम स्कूल’ में 13 टीचर हैं जिनमें से प्रिंसिपल और 3 टीचर वॉलंटियर हैं बाकी को तनख्वाह दी जाती है। ये स्कूल एक इमारत में चलता है जहां पर 7 कमरे और 2 हॉल हैं। बच्चों को शिक्षित करने के अलावा बड़ी उम्र की लड़कियों को नर्सिंग की ट्रेनिंग दी जाती है। इस ट्रेनिंग का स्तर इतना अच्छा है कि यहां से अब तक 200 लड़कियां नर्सिंग की ट्रेनिंग ले चुकी हैं और इन सभी को अलग अलग अस्पतालों में नौकरी भी मिल गई है। वहीं कुछ नया काम सीखने वाले लड़कों को 10वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद पलंबर और इलेक्ट्रिशियन की ट्रेनिंग कराई जाती है। सुमिति मित्तल स्लम में रहने वाले बच्चों को समझाती हैं कि अगर स्किल ट्रेनिंग के साथ-साथ वो पढाई भी करें तो उनका भविष्य सवंर सकता है। क्योंकि एक पढ़ा लिखा पलंबर और इलेक्ट्रिशियन भी इंजीनियर से अच्छा पैसा कमा सकता है।

स्किल डेवलपमेंट की ट्रेनिंग के लिए हर बच्चे से 50 रुपये महीना फीस ली जाती है। ताकि कोर्स करने वाले छात्र गंभीर हों। अपनी फंडिंग के बारे में सुमिति का कहना है कि शुरूआत में उन्होने अपना पैसा लगाया, लेकिन आज इनके काम को देखते हुए लोग खुद ही इनसे जुड़ रहे हैं। इसके अलावा सुमिति की सॉफ्टवेयर कंपनी के 200 लोग भी उनको अपनी सैलरी का कुछ हिस्सा देते हैं।