सोने की लंका को शिव जी ने बनवाया था और उसे हनुमान जी ने नहीं, बल्कि पार्वती जी ने जलाया था

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रामायण एक ऐसा महा ग्रन्थ है जिसके बारे में थोडा बहुत हम सब जानते है । कहा जाता है की रामायण उस महासागर की तरह है जिसके बारे में सम्पूर्ण ज्ञान रखना किसी एक व्यक्ति के वश की बात नहीं है, कही ऐसे प्रसंग है जिनके बारे में हम और आप नहीं जानते है । वेसे आप ने रामायण या तो किताबों से पढ़ी होगी या फिर टीवी में प्रसारित कार्यक्रमों के माध्यम से रामायण के बारे में जानकरी प्राप्त की होगी । हम सब ने टीवी और किताबों में पढ़ा और सुना है की रामायण में भगवान श्री राम और रावण के बीच युद्ध होता है और उस दोरान रावण के पास एक सोने की लंका होती है जिसे श्री राम के परम भक्त हनुमान जी जला कर खाक कर देते है ।

लेकिन हम जो आज बताने वाले है उसे सुनकर आप हैरान रह जायेंगे अगर कहे की ये लंका रावण की नहीं है तो फिर किस की है ? लंका को हनुमान जी ने नहीं जलाया था तो फिर किसने जलाया था ? इन सभी सवालो के जवाब हमारी पौराणिक कथाओं में है जो हम आप के लिए खोज कर लाये है । तो आइये जानते है हैरान करने वाले इन सभी सवालो के जवाब…..
पौराणिक कथाओं की माने तो ये लंका रावण की नहीं बल्कि मां पार्वती की थी । आप के दिमाग में अभी एक हि सवाल होगा की ये केसे हो सकता है ?

तो आइये जानते है इसके पीछे की पूरी कहानी….

बात उस समय की है जब भगवान विष्णु जी और माँ लक्ष्मी जी जब भगवान शिव जी और माता पार्वती से मिलने के लिए कैलाश पर्वत पर गए थे । कैलाश पर्वत जो पूरा बर्फ से ढका हुआ रहता है , तो माता लक्ष्मी जी को ठण्ड लगने लगी तो उन्होंने माता पार्वती जी से कहा की आप यहाँ केसे रहते हो और फिर वहा से जाते वक्त उन्होंने शिव जी और माता पार्वती जी को वेकुण्ठ आने का आग्रह किया और वहा से चल दिए ।

कुछ समय बाद माता पार्वती जी और शिव जी वैकुण्ड पधारे तो वहा माता पार्वती जी ने लक्ष्मी जी के वैभव को देखा तो मन हि मन जलने लगी और जैसे ही वे अपने कैलाश पर्वत पर पहुचे तो माता पार्वती ने शिव जी अपने लिए भी एक महल बनाने की जिद करने लगी । फिर क्या था पार्वती जी के लिए शिव जी ने धन के देवता कुबेर को एक अद्वितीय महल बनाने के लिए कहा था जिसे हम सब सोने की लंका कहते है ।

लेकिन जब इस सोने के महल पर रावण की नजर पड़ी तो उसके मन में लालच आया और उसे पाने के लिए रावण ने एक योजना बनायीं । जिसके अनुसार उसने ब्राह्मण का रूप धारण किया और पहुच गया भगवान शिव जी के पास और भिक्षा में सोने का महल मागने लगा उस समय शिव जी भी समझ गए की ये रावण है पर एक ब्राह्मण को अपने द्वार से केसे खाली हाथ जाने दे क्यों की शास्त्रों में भी वर्णित है की अपने घर आए हुए याचक को कभी भी खाली हाथ या भूखे नहीं जाने देना चाहिए ।

भगवान शिव जी धर्म के बंधन में बंधे हुए थे तो उन्होंने रावण को सोने का महल दान कर दिया लेकिन जब माता पार्वती जी को इस बात की जानकरी हुई तो उनको बड़ा क्रोध आया और शिव जी के शांत करने पर भी माता पार्वती का क्रोध शान्त नहीं हुआ और इसका बदला लेने का प्रण कर लिया ।

शिव जी ने जो सोने का महल रावण को दान किया था बाद में उसे सोने की लंका के नाम से जानने लगे थे ।
माँ पार्वती में बदले की भावना इतनी बड गयी की वे स्वयं इस महल को नष्ट करना चाहती थी । जब त्रेता युग में
भगवान श्री राम का जन्म हुआ था उस समय शिव जी ने हनुमान का रूप धारण किया और माता पार्वती ने हनुमान की पूछ का रूप धारण कर लिया था ।

हनुमान जी ने सोने की लंका को अपनी पूछ से जलाकर राख कर दिया था उस समय हनुमान की पूछ का रूप माता पार्वती जी ने धारण कर रखा था और माता पार्वती के क्रोध को शांत करने के लिए हनुमान जी ने अपनी पूछ को समुद्र में बूजा कर शांत की ।

इस कहानी में कितनी सच्चाई है इसके बारे में तो नहीं कहा जा सकता है ।

Source: punjabkesari

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