क्रांतिकारी राजेन्द्र लाहिड़ी ने हंसते-हंसते चूम लिया फांसी का फंदा

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आज़ादी की लड़ाई में काकोरी कांड सबसे प्रमुख घटनाओं में आती है। राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी भी भारत के अमर शहीद क्रांतिकारियों में से एक थे जिन्होंने इस घटना को अजाम दिया था।


आज़ादी के आन्दोलन को गति देने के लिये धन की तत्काल व्यवस्था की ज़रूरत को देखते हुए शाहजहांपुर राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी ने क्रान्तिकारियों की मदद से सरकारी खज़ाना लूट लिया था। अंग्रेज़ सरकार ने मुकदमा चलाकर राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक उल्ला ख़ां आदि को फ़ांसी की सज़ा सुनाई। …आइए जानते हैं इस महान् क्रांतिकारी के बारे में

कौन थे राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी

राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी का जन्म बंगाल के पाबना ज़िले के भड़गा नामक ग्राम में 23 जून, 1901 को हुआ था। इनके पिता का नाम क्षिति मोहन शर्मा और माता बसंत कुमारी था। बाद के समय में इनका परिवार 1909 ई. में बंगाल से वाराणसी चला आया था।


क्रांतिकारियों से मुलाकात


जिस समय राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी एम. ए. में पढ़ रहे थे, उनका संपर्क क्रांतिकारी सचिन्द्रनाथ सान्याल से हुआ। सान्याल बंगाल के क्रांतिकारी ‘युगांतर’ दल से संबद्ध थे। बाद में वे बम बनाने की शिक्षा प्राप्त करने और बंगाल के क्रांतिकारी दलों से संपर्क बढ़ाने के उद्देश्य से कोलकाता गए। वहां दक्षिणेश्वर बम फैक्ट्री कांड में पकड़े गए और इस मामले में दस वर्ष की सज़ा हुई।


काकोरी काण्ड की वो घटना


राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी बलीदानी जत्थों की गुप्त बैठकों में बुलाए जाने लगे थे। क्रान्तिकारियों द्वारा चलाए जा रहे आज़ादी के आन्दोलन को गति देने के लिए धन की तत्काल व्यवस्था की ज़रूरत के मद्देनजर शाहजहांपुर में रामप्रसाद बिस्मिल ने अंग्रेज़ी सरकार का खजाना लूटने की योजना बनायी।


सरकारी खज़ाना लूटा

इस योजनानूसार दल के ही प्रमुख सदस्य राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी ने 9 अगस्त, 1925 को लखनऊ के काकोरी रेलवे स्टेशन से छूटी ‘आठ डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेन्जर ट्रेन’ को चेन खींच कर रोका और क्रान्तिकारी पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में अशफ़ाक़ उल्ला ख़ां, चन्द्रशेखर आज़ाद व छ: अन्य सहयोगियों की मदद से समूची ट्रेन पर धावा बोलते हुए सरकारी खजाना लूट लिया गया।

सज़ा-ए-मौत

बाद में अंग्रेज़ी हुकूमत ने उनकी पार्टी ‘हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन’ के कुल 40 क्रान्तिकारियों पर सम्राट के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध छेड़ने, सरकारी खजाना लूटने व मुसाफिरों की हत्या करने का मुकदमा चलाया, जिसमें राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़ उल्ला ख़ां तथा ठाकुर रोशन सिंह को मृत्यु दण्ड (फांसी की सज़ा) सुनायी गयी।

शहादत को सलाम


अंग्रेज़ी सरकार ने डर से राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को गोण्डा कारागार भेजकर अन्य क्रांतिकारियों से दो दिन पूर्व ही 17 दिसम्बर, 1927 को फांसी दे दी। शहीद राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी ने हंसते-हंसते फांसी का फन्दा चूमने के पहले ‘वन्देमातरम’ की ज़ोरदार हुंकार भरकर जयघोष करते हुए कहा- मैं मर नहीं रहा हूं, बल्कि स्वतंत्र भारत में पुनर्जन्म लेने जा रहा हूं।


Rajendra Lahiri full name Rajendra Nath Lahiri, was an Indian revolutionary, who participated in some activities of the Hindustan Republican Association aimed at ousting the British from India.
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