पद्मनाभस्वामी मंदिर का सातवां द्वार है एक रहस्य, 16वीं सदी का ’सिद्ध पुरूष’ ही इसे खोल सकता है

केरल के तिरुवनन्तपुरम में स्थित पद्मनाभस्वामी मंदिर काफ़ी प्रसिद्ध है। यह मंदिर पूरी तरह से भगवान विष्णु को समर्पित है। यह भारत के प्रमुख वैष्णव मंदिरों में से एक है। देश-विदेश के कई श्रद्धालु इस मंदिर में आते हैं। इस मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु की विशाल मूर्ति विराजमान है, शेषनाग पर शयन मुद्रा में भगवान विराजमान। यह मंदिर काफ़ी रहस्यों से भरा है। यह विश्व का सबसे अमीर मंदिर है।

इस मंदिर में करीब 1,32,000 करोड़ की मूल्यवान संपत्ति है, जो स्विटज़रलैंड की संपत्ति के बराबर है। देखा जाए, तो इस मंदिर के पीछे कई कहानियां हैं, जिन्हें जानने के बाद आप भी हैरान हो जाएंगे।

18वीं शताब्दी में त्रावणकोर के राजाओं ने पद्मनाम मंदिर को बनाया था। सबसे अहम बात ये है कि इसका ज़िक्र 9वीं शताब्दी के ग्रंथों में भी आता है। 1750 में महाराज मार्तंड वर्मा ने खुद को ‘पद्मनाभ दास’ बताया, जिसका मतलब ‘प्रभु का दास’ होता है। इसके बाद शाही परिवार ने खुद को भगवान पद्मनाभ को समर्पित कर दिया। इस वजह से त्रावणकोर के राजाओं ने अपनी दौलत पद्मनाभ मंदिर को सौंप दिया।

1947 तक त्रावणकोर के राजाओं ने इस राज्य में राज किया। हालांकि, आज़ादी के बाद इसे भारत में विलय कर दिया गया। विलय होने के बावज़ूद सरकार ने इस मंदिर को अपने कब्ज़े में नहीं लेकर, त्रावणकोर के शाही परिवार को सौंप दी। अब इस मंदिर की देखभाल शाही परिवार के अधीनस्थ एक प्राइवेट ट्रस्ट करता है।

संपत्ति और रहस्य को देखते हुए कई लोगों ने इसके द्वारों को खोलने की मांग की थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। 7 सदस्यों की निगरानी में अब तक 6 द्वार खोले जा चुके हैं, जिनसे करीब 1,32,000 करोड़ के सोने और जेवरात मिले। लेकिन सबसे दिलचस्प बात सातवें गेट की है। ये अभी तक पूरी दुनिया के लिए रहस्य बना हुआ है, जिसे अभी तक खोला जाना है।

वैसे जब भी इस मंदिर के ख़जाने को खोलने की बात होती है, तो इसमें अनहोनी की कहानी भी जुड़ जाती है। दरअसल, सातवें गेट में ना कोई वोल्ट है, और ना ही कोई कुंडी। गेट पर दो सांपों के प्रतिबिंब लगे हुए हैं, जो इस द्वार की रक्षा करते हैं। इस गेट को खोलने के लिए किसी कुंजी की ज़रूरत नहीं पड़ती है, इसे मंत्रोच्चारण की मदद से ही खोल सकते हैं।

यह एक गुप्त गृह है, जिसकी रक्षा ‘नाग बंधम्’ करते हैं। इस गेट को कोई 16वीं सदी का ‘सिद्ध पुरूष’, योगी या फ़िर कोई तपस्वी ही ‘गरुड़ मंत्र’ की मदद से खोल सकता है।


नियमानुसार, ‘गरुड़ मंत्र’ का स्पष्ट तरीके से उच्चारण करने वाला सिद्ध पुरूष ही इस गेट को खोल पाएगा। अगर उच्चारण सही से नहीं किया गया, तो उसकी मृत्यु हो जाती है। अभी हाल में याचिकाकर्ता की संदिग्ध अवस्था में मृत्यु हो गई।

देश के शंकराचार्य इस पूरे मामले पर कहते हैं कि “सातवें दरवाजे को खोलने के बारे में देश का उच्चतम न्यायालय फैसला करने वाला है, ऐसे में मंदिर की संपत्ति की देख-रेख राजपरिवार के हाथों में सौंपना सही होगा।”

90 वर्षीय त्रावणकोर राजपरिवार के प्रमुख तिरुनल मार्तंड वर्मा ने अंग्रेज़ी अख़बार टेलीग्राफ़ को दिए एक इंटरव्यू में कहते हैं कि हमने अपनी पूरी ज़िंदगी इस मंदिर की देखभाल में लगा दी है। हम इस मंदिर और भगवान विष्णु की सेवा में तत्पर हैं। सातवें द्वार के खुलने का मतलब देश में प्रलय आना है। हमारी कोशिश है कि इसे रहस्य ही रहने दिया जाए।

इस मंदिर से मिली संपत्ति को देख कर अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि वाकई यह काफ़ी रहस्यमयी मंदिर है। कई लोगों का मानना है कि सभी संपतियों को जनता की भलाई के कामों में लगा देना चाहिए, जो काफ़ी हद तक सही भी है।
Source: Telegraph, quora