जानिए मेवाड़ की आन बान और शान कहे जाने वाले महाराणा प्रताप के जीवन से जुड़ी प्रेरक बातें

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मेवाड़ की आन बान और शान कहे जाने वाले महाराणा प्रताप मेवाड़ के महान हिंदू शासक थे. महाराणा प्रताप का नाम इतिहास के पन्ने में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा गया है . आज भी जब “वो महाराणा प्रताप कठे…  ” गीत को सुनते है तो मन में एक अद्भुत शक्ति का संचार होता है उनके लिए लिखे गए गीत में इतनी शक्ति है तो सोचिए उनका व्यक्तित्व कितना प्रभावशाली होगा | भारत के सबसे पहले स्वतंत्रता सेनानी माने जाने वाले महाराणा प्रताप की वीरता हम सब के लिए प्रेरणा का स्त्रोत है | 

कहते है की अपनी मातृभूमि की आन बान और शान  के लिए उन्होंने जंगलों में रहना और खाने में घास फूस तक को स्वीकार किया, अपना राज सिंहासन तक छोड़ दिया हो उस  राणा प्रताप की वीरता के आगे आज पूरा विश्व नतमस्तक है |  राणा प्रताप ने कहा था की जंगलो में घास फूस की रोटी खायेंगे लेकिन मरते दम तक मुग़लों के आगे शीश नहीं झुकाएंगे और आज इतिहास के पन्नों में महाराणा प्रताप की वीरता और स्वाभिमान की कहानी हमेशा के लिए अमर हो गयी | आज मुझे कवि की वो पंक्ति याद आ रही है कवि महोदय ने क्या खूब कहा की “शौर्य कभी सो जाए तो राणा प्रताप को पढ़ लेना”  इस तरह राणा प्रताप के आगे तो अकबर भी  पानी पानी था  

महाराणा प्रताप का जीवन

महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई, 1540 में कुम्भलगढ दुर्ग  मेवाड़ (राजस्थान) में हुआ था | महाराणा प्रताप मेवाड़ के राजा उदयसिंह और जैवन्ताबाई के पुत्र थे | महाराणा प्रताप  को बचपन में “कीका” नाम से पुकारा जाता था वे बचपन से हि बहादुर और साहसी थे | 

उन्होंने अपनी मातृभूमि की रक्षा और स्वाभिमान के लिए अपना जीवन कुर्बान कर दिया और मरते दम तक अपनी  मातृभूमि पर एक आच न आने दी | जब पूरे हिन्दुस्तान में मुगल राजा अकबर का खोफ था, तब वे 16वीं शताब्दी में अकेले ऐसे शासक थे जिन्होंने अकबर से समझोता करने के लिए मना कर दिया और मुगलों से खुली जंग का उदगोष किया | अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए घास फूस की रोटी खायी और महलों को त्याग जंगलों में रहे लेकिन अंतिम क्षण तक मुगलों के आगे अपना शीश नहीं झुकाया |

प्रताप के सामने अकबर ने प्रस्ताव रखा था कि अगर  वो उनकी गुलामी  को स्वीकार करते है तो उन्हें अपने राज्य के साथ साथ  अन्य राज्य भी देंगे लेकिन राणा प्रताप से समझोता करने से इंकार कर दिया और जीवन भर अपनी मातृभूमि की रक्षा और स्वाभिमान के लिए संघर्ष करते रहे |

महाराणा प्रताप की शारीरक विशेषता कुछ इस तरह की थी,उनका वजन लगभग 110 किलो,  शरीर पर पहना हुआ उनका सुरक्षा कवच 72 किलो का और कद आठ फुट का और उनके भाले का वजन 80 किलो का था | आज भी महाराणा प्रताप की अमूल्य धरोहर को उदयपुर राजघराने के संग्रहालय में सुरक्षित रखा हुआ है |

हल्दीघाटी का युद्ध

महाराणा प्रताप और अकबर की सेना के बीच हल्दीघाटी में युद्ध १८ जून १५७६ ईस्वी में हुआ था | इस युद्ध में मेवाड़ की सेना का नेतृत्व महाराणा प्रताप कर रहे थे जिनकी तरफ से लडने वाले एकमात्र मुस्लिम सरदार थे -हकीम खाँ सूरी। जिनके पास महज 20000 सेनिक थे वही दूसरी और मुगल सेना का नेतृत्व मानसिंह  कर रहा था, मुगलों के पास अथाह संसाधन और सेन्य ताकत थी किन्तु उसके बावजूद भी महाराणा प्रताप ने अपने घुटने नहीं टेके और मेवाड़ की आन बान और शान  के लिए संघर्ष करते रहे| हल्दीघाटी का युद्ध इतना भयंकर था कि इस युद्ध के इतने वर्षों बाद भी हल्दीघाटी में 1985 में तलवारों का जखीरा को खोजा गया था|

चेतक (Chetak)

कहते है की महाराणा प्रताप का प्रिय घोड़ा चेतक था जिसकी वीरता भी विश्व विख्यात है|  हल्दीघाटी में चेतक की स्मृति में उनकी विशाल प्रतिमा बनायीं गयी है  | चेतक ने अपनी जान दांव पर लगाकर 26 फुट गहरे नाले से छलाग लगा कर महाराणा प्रताप की रक्षा की थी|

जब  महाराणा प्रताप की म्रत्यु की खबर अकबर ने  सुनी तो वो भी सुनकर सुन्न हो गया था|  क्यों की अकबर जानता था कि महाराणा प्रताप जैसा वीर इस पूरी दुनिया में नहीं है|D..

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