अकबर पहुंचा था इस माता के दरबार में सोने का छत्र चढाने लेकिन माता ने किया ऐसा चमत्कार की आप जानकर दंग रह जाओगे ,जानिए माता के इस मंदिर के बारे में …

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नवरात्री के इन पावन दिनों में माता की अपार अनुकम्पा सब पर बनी रहती है ऐसे पवित्र और पावन दिनों में जो भी माता की सच्ची श्रद्धा से पूजा अर्चना करता है माता उसके सारे कष्टों को हर लेती है। इस पावन अवसर पर माता ज्वाला उस मंदिर के बारे में आपको जानकारी देंगे जहां अकबर जैसा शासक ने सोने का छत्र चढ़ाने पहुंचा था आईये जानते है इसके बारे में …..

मां भगवती के शक्तिपीठों में से एक ज्वाला देवी हिमाचल प्रदेश में स्थित हैं। मां जोता वाली के मंदिर को नगरकोट भी कहा जाता है। इस मंदिर का सबसे बड़ा चमत्कार यह है कि इसमे किसी मूर्ति की नहीं बल्कि पृथ्वी के गर्भ से निकल रही 9 ज्वालाओं की पूजा होती है।ज्वाला देवी मंदिर में सदियों से प्राकृतिक ज्वालाएं जल रही हैं। संख्या में कुल 9 ज्वालाएं, मां दुर्गा के 9 स्वरूपों का प्रतीक हैं। इनका रहस्य जानने के लिए पिछले कई साल से भू-वैज्ञानिक जुटे हुए हैं लेकिन 9 किमी खुदाई करने के बाद भी उन्हें आज तक वह जगह ही नहीं मिली जहां से प्राकृतिक गैस निकलती हो।

सबसे पहले इस मंदिर का निर्माण राजा भूमि चंद ने कराया था यहां पर पृथ्वी के गर्भ निकलती इन ज्वालाओं पर ही मंदिर बना दिया गया हैं। इन 9 ज्योतियों को महाकाली, अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विंध्यावासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अम्बिका, अंजीदेवी के नाम से भी पूजा जाता है। साल 1835 में महाराजा रणजीत सिंह और राजा संसार चंद ने इस मंदिर का पुननिर्माण करवाया।

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यह मंदिर देवी के 51 शक्तिपीठों में शामिल है। शक्तिपीठ वह स्थान कहलाते हैं, जहां माता सती के शरीर के अंग गिरे थे। जब भगवान शिव देवी सती के मृत शरीर को हाथों में उठाए, दुखी मन से ब्रह्मांड में इधर-उधर भटक रहे थे तब उनके मन को इस व्याकुतला से बाहर लाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने चक्र से सती के शरीर के टुकड़े कर दिए थे। जिन जगहों पर सती के अंग गिरे वहां-वहां शक्तिपीठ बने। धार्मिक मान्यता है कि इन शक्तिपीठों पर मां हर समय निवास करती हैं और यहां प्रार्थना करने पर मनोकामना जल्द पूरी होती है । 

मान्यता है कि इस मंदिर वाली जगह पर माता सती की जीभ गिरी थी। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा शहर से करीब 30 किलोमीटर दूर स्थित इस मंदिर को खोजने का श्रेय पांडवों को जाता है । ब्रिटिश हुकूमत के वक्त अंग्रेजों ने ज्वाला देवी मंदिर की ज्वाला का रहस्य जानने और जमीन के नीचे दबी ऊर्जा का उपयोग करने की बहुत कोशिश की लेकिन लाख कोशिशों के बाद भी उनके हाथ कुछ नहीं लगा। आजादी के बाद भूगर्भ वैज्ञानिकों ने भी इस दिशा में प्रयास किए लेकिन मंदिर में निकलती ज्वालाएं रहस्य ही बनी रहीं। 

मंदिर के चमत्कार पर शक करते हुए मुगल बादशाह अकबर ने इसे बुझाने के लिए नहर तक खुदवाई लेकिन नाकामयाब रहा। यह नहर आज भी मंदिर के बायीं ओर देखने को मिलती है। बाद में इस चमत्कार के आगे नतमस्तक होकर अकबर मंदिर में सवा मन का सोने का छत्र चढ़ाने भी पहुंचा लेकिन माता ने उसे स्वीकार नहीं किया और वह गिरकर किसी अन्य धातु में बदल गया मंदिर के बारे में ध्यानू भगत की कहानी भी प्रसिद्ध है, जिसने अपनी भक्ति सिद्ध करने के लिए अपना शीश मां को चढ़ा दिया था। मान्यता है कि इस मंदिर में आकर ज्योति के दर्शन करने से हर मनोकामना पूरी होती है।

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