लड़के ने लड़की के साथ वो किया वो जिसे करने से पहले हैवान भी 50 बार सोचेगा..

3 मई 2016 का दिन. पाकिस्तान का लाहौर शहर. खदीजा सिद्दीकी अपनी 7 साल की छोटी बहन को लेने उसके स्कूल पहुंची हुई थी. उसकी उम्र 22 साल थी उस वक़्त. वो लॉ की पढ़ाई कर रही थी. वकील बनना चाहती थी. बहन के स्कूल पहुंच कर उसने अपनी गाड़ी पार्क की. और उस अहाते की तरफ बढ़ी, जहां उसकी बहन उसका इंतज़ार कर रही थी. अभी वो कुछ ही कदम बढ़ पाई थी कि पीछे से किसी ने उस पर हमला कर दिया. इससे पहले कि वो कुछ समझ भी पाती, कोई उस पर चाकू से ताबड़तोड़ वार कर रहा था. अंधाधुंध.

पेट में, सीने पर, गर्दन पर. हर गुज़रते सेकण्ड में तेज़ धार वाला स्टील उसके जिस्म में उतर रहा था. पीड़ा और दहशत से खदीजा का दिमाग सुन्न हो गया था. ज़िंदगी का दामन हाथ से लगभग छूट ही गया था. 1-2 नहीं, पूरे 23 वार सहे उसके जिस्म ने. कुछ ही पलों में वो अपने ही लहू से सराबोर ज़मीन पर पड़ी थी. उसका हमलावर भाग चुका था.

हमला खुले में, सबके सामने हुआ था. ऊपर से हमलावर रसूखदार शहरी की औलाद था. फ़ौरन ही पता चल गया कि ये किया किसने है. उस वहशी का नाम शाह हुसैन था. वो खदीजा का ही क्लास फेलो था. उससे दोस्ती तोड़ लेने से वो खदीजा से खफ़ा था. उसको सबक सिखाना चाहता था. शाह हुसैन के पिता लाहौर सय्यद तनवीर हाशमी लाहौर के बड़े और ऊंची पहुंच वाले वकील थे. बाप की पहुंच का गुमान ही था, जिसने शाह हुसैन को भीड़ के बीच कातिलाना हमला करने को उकसाया. उसने अपनी निगाह में तो खदीजा को मार ही दिया था. ये तो खदीजा की जीवटता ही थी, जो वो मौत के मुंह से लौट आई.

जब इंसाफ की लड़ाई में, खदीजा के खिलाफ़ पूरा सिस्टम आ खड़ा हुआ

खदीजा मरी नहीं. लंबे समय तक हॉस्पिटल में रह कर मौत से लड़ने के बाद, वो ठीक हुई. एक नई लड़ाई लड़ने के लिए. इस बार उसे सिस्टम से दो-दो हाथ करने थे. हमारे मुल्क की तरह ही पाकिस्तान में भी अक्सर इंसाफ रसूखदार की ड्योढ़ी पर बंधा कुत्ता ही होता है. उनके इशारों पर दुम हिलाता हुआ. खदीजा का साथ देने के बजाय, तमाम बड़े लोग इस इंतज़ाम में जुट गए कि शाह हुसैन का बाल न बांका हो.

खदीजा को अपना केस लड़ने के लिए एक वकील तक मिलना मुश्किल हो गया. उधर शाह हुसैन को डिफेंड करने के लिए वकीलों की पूरी फ़ौज थी. खुद आरोपी के पिता बड़े लॉयर थे. इसके अलावा शाह हुसैन की खिदमत में थे,

जैसे समूची लॉयर बिरादरी ही एक हत्यारे को डिफेंड करने उतरी थी. एकजूटता का ये वीभत्स उदाहरण था. बेशर्मी का आलम ये था कि पूरे मुल्क में इस केस को ‘खदीजा बनाम बार एसोसिएशन’ कहा गया.

वर्णिका कुंडू की तरह वहां भी विक्टिम पर ही पिल पड़े लोग

जिस तरह चंडीगढ़ की वर्णिका पर ट्रबल को इन्वाईट करने के आरोप लगे, उसके कपड़े, उसके रहन-सहन पर तनक़ीद की गई, उसी तरह खदीजा के साथ भी हुआ. खदीजा से भरे कोर्ट में अटपटी बातें कही गईं. जैसे कि तुम पॉश इलाके में रहती हो, कार चलाती हो, मॉडर्न हो वगैरह-वगैरह.

जैसे पॉश इलाके में रहना गुनाह हो. कार चलाने से कानून की धारा भंग होती हो. मॉडर्न होना मर्डर को इनविटेशन देने का हो. कोर्ट के बाहर खदीजा पर केस वापस लेने का दबाव बनता रहा और कोर्ट में उसका चीर-हरण होता रहा. समर्थों की पहुंच का ज़हूरा कुछ यूं दिखा कि कुछ ही दिनों बाद शाह हुसैन को ज़मानत पर छोड़ दिया गया.

जब विडंबना को भी शर्म आई होगी

बात इस साल मई की है. खदीजा का एग्जाम था. पिछले साल वो शाह हुसैन की मेहरबानी से एग्जाम दे नहीं पाई थी. इस बार पूरी तरह प्रतिबद्ध थी वो. लेकिन विडंबना देखिए कि उसी स्कूल में वो शख्स भी एग्जाम दे रहा था, जिसने उसे लगभग मार ही दिया था. शाह हुसैन भी अपने बाप की तरह वकील बनना चाहता था. वो भी खदीजा के साथ-साथ एग्जाम दे रहा था. जिसे सलाखों के पीछे होना चाहिए था, वो कानून का रखवाला बनने की कोशिश कर रहा था. आयरनी भी मुंह छिपा कर रोती होगी.

मीडिया ने दिलाया इंसाफ

मई की इस विडंबना के बाद पाकिस्तानी जनता में आक्रोश फैलने लगा. मीडिया ने भी इस मुद्दे को हाईप देना शुरू किया. खदीजा के हक़ में माहौल बनने लगा. खदीजा हर मुमकिन प्लेटफॉर्म पर अपनी बात रख ही रही थी. उसने हथियार कभी डाले ही नहीं. आखिरकार लाहौर हाई कोर्ट ने शाह हुसैन को 7 साल की सज़ा सुना दी. कोर्ट ने माना कि आरोपी ने पूरी निर्दयता से विक्टिम पर चाकू के वार किए थे. उसका इरादा उसकी जान लेने का ही था. ऐसे में आरोपी को कोई रियायत नहीं दी सकती. 7 साल की जेल के साथ-साथ 3 लाख 34 हज़ार का जुर्माना भी ठोक दिया. जब तक वो जुर्माना न भर दे, उसे जेल से रिहा नहीं किया जाएगा.

कोर्ट के फैसले के बाद प्रेस कांफ्रेंस करती खदीजा.

ताकतवरों के खिलाफ़ एक अकेली लड़की का ये संघर्ष रोंगटे खड़े कर देने वाला है. कई मामलों में हमारा पड़ोसी मुल्क बिल्कुल हमारे जैसा ही है. जब भी कोई ऊंची हस्ती क़ानून के शिकंजे में फंसती है, पूरा तंत्र उसकी हिफाज़त में लग जाता है. इनके जाल को काट कर इंसाफ तक पहुंच बना पाना बहुत बड़ा टास्क है. खदीजा सिद्दीकी को बधाई जो ये कर के दिखा सकी.

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