क्या कंडोम की कमी की वजह से भारत एड्स से लड़ाई में पिछड़ रहा है?

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सृष्टि की उत्पत्ति और संवर्धन में कोई एक चीज़ जिससे पूरी दुनिया साम्य रखती है वह संभोग(सेक्स) है. संभोग जो नई पीढ़ी की उत्पत्ति के लिए किया जाता है. संभोग जो आनंद के लिए किया जाता है, मगर संभोग इधर ख़ुद के साथ कई लाइलाज बीमारियां भी लेकर आया है. इनमें से प्रमुख बीमारी है एचआईवी/ एड्स जिसे लेकर पूरी दुनिया ख़ासी चिंतित है.


दुनिया के अलग-अलग देशों की सरकारें सुरक्षित संभोग व एड्स की रोकथाम के लिए मुफ़्त में कंडोम भी बंटवाती रही हैं. ज्ञात हो कि इन मुफ़्त कंडोम्स को सामुदायिक केन्द्रों और सामुदायिक अस्पतालों से लिया जा सकता है. इस पूरे मामले में यदि वर्ल्ड बैंक की मानें तो 1995 से 2015 के बीच सिर्फ़ कंडोम की वजह से 30 लाख से अधिक एड्स के मामले नहीं पैदा हो सके हैं.

इधर हाल ही में जारी किए गए सरकारी आकड़े को ही यदि सच माना जाए तो भारत के 31 राज्यों की दो तिहाई एड्स यूनिट के पास अगले एक माह के कंडोम आपूर्ति हेतु अपर्याप्त कंडोंम हैं. वहीं कुछ राज्यों के पास तो सिर्फ़ कुछ दिनों के ही कंडोम उपलब्ध हैं. 

ज्ञात हो कि एड्स एक वायरस की वजह से फैलता है जिसे (ह्यूमन इम्यूनोडिफिसियेंसी सिंड्रोम) के नाम से जाना जाता है. इस वायरस का संक्रमण रक़्त, मां के दूध और असुरक्षित यौन संबंधों की वजह से फैलता है. इस बीमारी की चपेट में अधिकतर गरीब और मजदूर आते हैं जिन्हें इस बात का आभाष नहीं होता कि वे असुरक्षित यौन संबंधों से किस बीमारी के शिकार हो सकते हैं.

राष्ट्रीय परेशानी…
वैसे तो कंडोम बाज़ार में बहुत ही सस्ते दामों पर भी उपलब्ध हैं, मगर महिला यौन कर्मी सामाजिक बुनावटों और किन्हीं दिक्कतों की वजह से इन्हें किसी मेडिकल स्टोर से खरीदने में ख़ुद को असहज पाती हैं.
इन महिला यौनकर्मियों में से अधिकतर गरीब परिवारों से ताल्लुक रखती हैं और यदि उनका ग्राहक कंडोम लेकर नहीं आता है जैसा कि प्राय: होता है तो उन्हें असुरक्षित यौन संबंध भी स्थापित करना पड़ता है. जाहिर है कि यदि किसी एक यौनकर्मी को भी यह संक्रामक रोग लग गया तो इस लाइलाज बीमारी की चपेट में कई आ सकते हैं. जो न उनके लिए अच्छा होगा और न बाहरी समाज के लिए…

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