क्या जानते हैं आप? बंजारे कहां से आए, कैसे जीते हैं जीवन

बंजारों का इतिहास देखा जाए तो यह कौम निडर, निर्भीक, साहसिक, लड़ाकू और जुझारू रही है। इस समुदाय ने खुद को अन्य समुदाय से अलग रखा है।
 

जीवन भर घूमने के चलते बंजारा समुदाय सफर का पर्याय बन चुके हैं। बंजारों का न कोई ठौर-ठिकाना होता है, ना ही घर-द्वार। पूरी जिंदगी ये समुदाय यायावरी में निकाल देते हैं। किसी स्थान विशेष से भी इनका लगाव नहीं होता। एक स्थान पर यह ठहरते नहीं। सदियों से ये समाज देश के दूर-दराज इलाकों में निडर हो यात्राएं करता रहा है।



बंजारे कुछ खास चीजों के लिए बेहद प्रसिद्ध हैं, जैसे नृत्य, संगीत, रंगोली, कशीदाकारी, गोदना और चित्रकारी। बंजारा समाज पशुओं से बेहद लगाव रखते हैं। अधिकतर बंजारों के कारवां में बैल होते हैं जिनमें वो अस्थायी घर बनाकर रखते हैं। इसमें रोजाना इस्तेमाल की जाने वाले सामान वे रखते हैं। दिनभर चलना और सूर्यास्त पर कहीं डेरा डालकर वहीं ये खाना बनाते हैं।

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शहर में आम तौर पर सड़क किनारे टेंट में या फिर खुले में अस्थायी तौर पर कुछ लोग रहते दिख जाएंगे। कई बार ये लोग 2 से 3 दिन तो कई बार हफ्तों ऐसे ही समय गुजार देते हैं। सड़क किनारे दिख रहे इन घुमंतू लोगों के साथ बैलगाड़ी या फिर कोई और जानवर भी दिख ही जाएगा। ये बंजारे लोग ऐसे ही पूरा जीवन घूमते हुए गुजार देते हैं। महिलाएं तो इन जगहों पर पूरा दिन रहती हैं, जबकि पुरुष मेहनत-मजदूरी कर कुछ पैसे इकट्ठा कर फिर अगले पड़ाव की ओर बढ़ जाते हैं।


आम तौर पर बंजारा पुरुष सिर पर पगड़ी बांधते हैं। कमीज या झब्बा पहनते हैं। धोती बांधते हैं। हाथ में नारमुखी कड़ा, कानों में मुरकिया व झेले पहनते हैं। अधिकतर ये हाथों में लाठी लिए रहते हैं।

बंजारा समाज की महिआएं बालों की फलियां गुंथ कर उन्हें धागों में पिरोकर चोटी से बांध देती हैं। महिलाएं गले में सुहाग का प्रतीक दोहड़ा पहनती हैं। हाथों में चूड़ा, नाक में नथ, कान में चांदी के ओगन्या, गले में खंगाला, पैरों में कडि़या, नेबरियां, लंगड, अंगुलियों में बिछिया, अंगूठे में गुछला, कमर पर करधनी या कंदौरा, हाथों में बाजूबंद, ड़ोडि़या, हाथ-पान व अंगूठियां पहनती हैं। कुछ महिलाएं घाघरा और लहंगा भी पहनती हैं। लुगड़ी ओढ़नी ओढ़ती हैं। बूढ़ी महिलाएं कांचली पहनती हैं।

मध्य भारत के बंजारों में एक विचित्र वृषपूजा का भी प्रचार है। इस जन्तु को ‘हतादिया’ (अवध्य) तथा बालाजी का सेवक मानकर पूजते हैं, क्योंकि बैलों का कारवां ही इनके व्यवसाय का मुख्य सहारा होता है। बैलों की पीठ पर बोरियाँ लादकर चलने वाले ‘लक्खी बंजारे’ कहलाते थे।

लोकगीत व लोकनृत्य बंजारों के जीवन का अभिन्न हिस्सा है। कई फिल्मों में भी बंजारों पर गाना फिल्माया जा चुका है। इनमें कई गीत तो सुपरहिट हुए हैं जो आज भी लोगों की जुबान पर रहते हैं। कई पुरानी फिल्में तो बंजारों की पृष्ठभूमि पर ही बनी है।

कहते हैं कि जहां बंजारे अपना डेरा डालते थे, उनमें से कुछ स्थानों पर वे अपने धन को सुरक्षित रखने के लिए जमीन में गाड़ देते थे। बड़द बंजारे अधिकरतर अपना पैसा गाड़ कर रखते थे। किसी जमाने में बंजारे देश के अधिकांश भागों में परिवहन, वितरण, वाणिज्य, पशुपालन और दस्तकारी से अपना गुजारा करते थे।

छत्तीसगढ़ के बंजारे ‘बंजारा’ देवी की पूजा करते हैं, जो इस जाति की मातृशक्ति की द्योतक हैं। सामान्यत: ये लोग हिन्दुओं के सभी देवताओं की आराधना करते हैं।

बंजारों का धर्म जादूगरी है और ये गुरु को मानते हैं। इनका पुरोहित भगत कहलाता है। सभी बीमारियों का कारण इनमें भूत-प्रेत की बाधा, जादू-टोना आदि माना जाता है। छत्तीसगढ़ के बंजारे ‘बंजारा’ देवी की पूजा करते हैं, जो इस जाति की मातृशक्ति की द्योतक हैं। सामान्यत: ये लोग हिन्दुओं के सभी देवताओं की आराधना करते हैं।

कहते हैं कि हैदराबाद की बंजारा हिल्स में कभी बंजारों की बस्ती हुआ करती थी। यहां अब सेठों, राजनेताओं, फ़िल्मी हस्तियों के आलीशान भवन हैं। संपूर्ण भारत में बंजारा समाज की कई उपजातियां है, जिनमें राजस्थान में बामणिया, लबाना, मारू भाट और गवारियां उपजाति है। जनसंख्या के लिहाज से बामणिया बंजारा समुदाय सबसे बड़ा माना गया है। बंजारा समुदाय हमेशा उत्पीड़न का शिकार होता रहा है चाहे सामंतशाही व्यवस्था से या अंग्रेजों से या फिर आजादी के बाद सरकारी नीति से।

पहले बंजारा समाज का मुख्य व्यवसाय नमक का था। आजादी की लड़ाई में बंजारों के योगदान को हमेशा कमतर आंका गया है। घुमंतू होने की वजह से ये सूचनाओं के आदान-प्रदान का बेहद विश्वसनीय जरिया थे। बाद में अंग्रेजों ने बंजारा समुदाय को आर्थिक रूप से कमजोर करने के लिए 31 दिसंबर 1859 को ‘नमक कर विधेयक’ थोप दिया। बंजारा समुदाय ने इसका विरोध प्रदर्शन किया। गांधी जी के साथ 1930 में उन्होंने विरोधस्वरूप दांडी मार्च भी किया।

अंग्रेजों के इस फैसले से नमक के व्यापारी बंजारों की कमर टूट गई। आखिरकार उन्हें अपना पैतृक नमक का व्यवसाय बदलना पड़ा। उसके बाद से बंजारा समाज आज तक छोटे-मोटे काम कर जीवन-यापन करते हैं। बंजारा समुदाय के महिला-पुरुष गोंद, कंबल और चारपाई जैसे सामान बेचने को मजबूर हुए। कई को शहरों का रुख करना पड़ा।

बंजारा समाज के लिए हर राज्य में अलग-अलग कानून बना है। इसके चलते किसी राज्य में ये अनुसूचित जनजाति में तो किसी में पिछड़ा वर्ग में आते हैं। पूरे देश में एक समान कानून न होने से ये समाज आज भी अलग-थलग पड़ा हुआ है।

बंजारा समाज का इतिहास सदियों पुराना है। बंजारा समाज की संख्या महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश में सर्वाधिक है। एक अलग ही संस्कृति में जीने वाले इस समाज को अपनी विशिष्ट पहचान के लिए ही जाना जाता है। बंजारा राजस्थान का ऐसा घुमंतु समुदाय है जो अन्य क्षेत्रों में भी पहुंचकर अपनी परंपरा को बहुत कुछ सुरक्षित रखे हुए हैं।

उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर, बिजनौर, पीलीभीत, बरेली, अलीगढ़, मुज़फ्फ़रनगर, इटावा, मुरादाबाद, मथुरा, एटा, आगरा और मध्य प्रदेश के जबलपुर, छिन्दवाड़ा, मंडला तथा गुजरात के पंचमहाल, खेड़ा, अहमदाबाद व साबरकांठा क्षेत्रों में बंजारे काफी संख्या में दिख जाएंगे।

कहते हैं कि सबने पहले राजस्थान से बंजारे बाहर निकले जो गुजरात, महाराष्ट्र, आन्ध्र-तेलंगाना होते हुए कर्नाटक तक गए। कुछ बंजारे मध्य प्रदेश होते हुए उत्तर प्रदेश, पंजाब तक गए।

बंजारों का इतिहास देखा जाए तो यह कौम निडर, निर्भीक, साहसिक, लड़ाकू और जुझारू रही है। इस समुदाय ने खुद को अन्य समुदाय से अलग रखा है। बंजारों की खासियत यह होती है कि ये किसी स्थान की सीमा को स्वीकार नहीं करते। बेधड़क, बेहिचक ये बढ़ते जाते हैं। बंजारों ने व्यापार के जरिए देश को विभिन्न भागों से जोड़ा है।

राजस्थान में बंजारा समाज की दो प्रमुख खापें हैं, बड़द और लमाना। बड़द बंजारे बड़द यानि बैलों का व्यापार करते थे। दूसरे लमाना जिन्हें लम्बाना या लम्बानी भी कहते हैं। ये लवण यानी कि नमक का कारोबार वस्तु विनिमय के आधार पर किया करते थे।