आखिर क्या खास है यहां जिसके कारन हिंदू और मुस्लिम दोनों की आस्था हैं

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वैसे तो हिन्दू और मुसलमानों ने धर्म के आधार पर अपने अलग-अलग स्थान बांट रखे हैं। किसी नें मंदिर बना रखे हैं, तो किसी ने मस्जिद, लेकिन एक जगह ऐसी भी है जहां इन दोनों समुदाय की रूची बराबर बनी हुई है। दरअसल मुस्लिम जहां इसे मस्जिद मानते हैं, तो हिंदू भोजशाला। भोजशाला का अपना एक अलग ही इतिहास है और इसी इतिहास की बदौलत ही इसमें दोनों धर्मों के लोगों की आस्था है और अक्सर विवाद भी गहरा जाता है। आइए बताते हैं इस जगह के बारे में।


 

क्या है भोजशाला का इतिहास


भोजशाला राजा भोज द्वारा निर्मित संस्कृत पाठशाला तथा सरस्वती का मन्दिर था। कहते हैं कि राजा भोज देवी सरस्वती के उपासक थे। उन्होंने धार में 1034 ईस्वी में भोजशाला के रूप में एक भव्य पाठशाला बनवाकर उनकी प्रतिमा स्थापित की। उस जमाने में वागदेवी के इस मंदिर में चालीस दिन का विशाल बसंतोत्सव मनाया जाता था। मध्यकाल में मुस्लिम शासकों के वक्त ये सिलसिला टूटा। मगर करीब पैंसठ साल से धार की भोज उत्सव समिति ने ये सिलसिला कायम रखा है।

कुछ इतिहासकारों के मुताबिक, 1305 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी ने भोजशाला को ध्वस्त कर दिया और देवी की मूर्ति को खंड़ित कर दिया। बाद में दिलावर खां गौरी ने 1401 ईस्वी में भोजशाला के एक भाग में मस्जिद बनवा दी। 1456 में महमूद खिलजी ने भोजशाला के भीतर मौलाना कमालुद्दीन के मकबरे और दरगाह का निर्माण करवा दिया। हालांकि, दरगाह बनने के कई सौ साल तक इस जगह पर विवाद नहीं हुआ। अंग्रेजी राज से यहां विवाद की स्थिति बन गई, जो आजादी के बाद लगातार तेज होती गई।

दरअसल ये भोजशाला 11 वीं सदी में राजा भोज ने बनाई थी। उसके बाद मुस्लिम शासक आए और कमाल मौला मस्जिद बन गई, लेकिन हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल कायम करते हुए यहां नमाज भी होती रही और वागदेवी यानि देवी सरस्वती की पूजा भी होती रही।

भोजशाला में मंदिर तो है मगर मूर्ति नहीं। इसके अंदर जो वागदेवी की मूर्ति है वो लंदन के म्यूजियम में रखी है जिसे की कई सालों से हिंदुस्तान वापस लाने की बात होती रही है लेकिन अभी तक वागदेवी वापस भोजशाला नहीं आ पाई हैं।

खुदाई में मिली थी प्रतिमा


वाग्देवी की प्रतिमा भोजशाला के नजदीक खुदाई के दौरान मिली थी। इतिहासकारों के अनुसार, यह प्रतिमा 1875 में खुदाई में निकली थी। 1880 में ‘भोपावर’ का पॉलिटिकल एजेंट मेजर किनकेड इसे अपने साथ लंदन ले गया। वहां के एक म्यूजियम में ये आज भी रखी हुई है। भोजशाला को 1909 में संरक्षित स्मारक घोषित कर दिया। बाद में भोजशाला को पुरातत्व विभाग के अधीन कर दिया गया।

1935 में नमाज की अनुमति


धार स्टेट ने ही 1935 में भोजशाला परिसर में नमाज पढऩे की अनुमति दी थी। स्टेट दरबार के दीवान नाडकर ने तब भोजशाला को कमाल मौला की मस्जिद बताते हुए शुक्रवार को जुमे की नमाज अदा करने की अनुमति वाला ऑर्डर जारी किया था। फिर दोनों समुदायों की ओर से नमाज और पूजा होने लगी।


इससे पहले भी हुआ है विवाद


वर्षो से चले आ रहे विवाद के बीच 2003, 2006 और 2013 को वसंत पंचमी शुक्रवार को होने के कारण विवाद हुआ। तनाव बढ़ा, 2003 में तो हिंसा भी हुई थी।

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