जानिए क्यों एकलव्य ने गुरू दक्षिणा में गुरूद्रोणाचार्य को अपना अंगूठा काटकर दे दिया… जानिए महान शिष्य एकलव्य के बारे में

सदियों के बाद आज भी अगर किसी महान शिष्य की बात आती है तो सभी की जुबान पर सबसे पहला नाम एकलव्य का ही आता है। एकलव्य एक ऐसे शिष्य थे , जिन्होंने अपने गुरू को गुरूदक्षिणा में अपना अंगूठा काटकर दे दिया था। अगर आप एकलव्य के बारे में नहीं जानते हैं तो चलिए हम आपको एकलव्य की कथा के बारे में विस्तार से बताते हैं

प्राचीन काल में विद्यार्थियों को शिक्षा ग्रहण करने के लिए अपने गुरु के पास आश्रम में रहना पड़ता था। सभी शिष्य बड़ी निष्ठा और ईमानदारी के साथ शिक्षा प्राप्त करते थे। उस समय ब्राह्मणों और क्षत्रियों के अलावा किसी को भी शिक्षा नहीं दी जाती थी। जब श्रृंगवेरपुर में निषादराज हिरण्यधनु की रानी सुलेखा ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम “अभिद्युम्न” रखा गया। बचपन में वह “अभय” के नाम से जाना जाता था। बचपन में जब “अभय” शिक्षा के लिए अपने कुल के गुरुकुल में गया तो अस्त्र शस्त्र विद्या में बालक की लगन और एकनिष्ठता को देखते हुए गुरू ने बालक को “एकलव्य” नाम से संबोधित किया।

एकलव्य को अपनी धनुर्विद्या से संतुष्टि न थी इस कारण उसने धनुर्विद्या की उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए उस समय धनुर्विद्या में दक्ष गुरू द्रोण के पास जाने का फैसला किया। एकलव्य के पिता जानते थे कि द्रोणाचार्य केवल ब्राह्मण तथा क्षत्रिय वर्ग को ही शिक्षा देते हैं और उन्होंने एकलव्य को भी इस बारे में बताया परंतु धनुर्विद्या सीखने की धुन और द्रोणाचार्य को अपनी कलाओं से प्रभावित करने की सोच लेकर उनके पास गया। परंतु ऐसा कुछ भी न हुआ और गुरु द्रोणाचार्य ने उसे अपमानित कर अपने आश्रम से निकाल दिया।

एकलव्य इस बात से तानिक भी आहत नहीं हुआ और उसने वहीं जंगल में रह कर धनुर्विद्या प्राप्त करने के ठान ली। उसने जंगल में द्रोणाचार्य की एक मूर्ती बनाई और उन्हीं का ध्यान कर धनुर्विद्या में महारत हासिल कर ली। एक दिन आचार्य द्रोण अपने शिष्यों और एक कुत्ते के साथ आखेट के लिए उसी वन में पहुंच गए जहां एकलव्य रहते थे। उनका कुत्ता राह भटक कर एकलव्य के आश्रम पहुंच गया और भौंकने लगा। एकलव्य उस समय धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहे थे। कुत्ते के भौंकने की आवाज से एकलव्य की साधना में बाधा पड़ रही थी। अतः उसने ऐसे बाण चलाए की कुत्ते को जरा सी खरोंच भी नहीं आई और कुत्ते का मुंह भी बंद हो गया।

कुत्ता असहाय होकर गुरु द्रोण के पास जा पहुंचा। गुरू द्रोण ऐसी श्रेष्ठ धनुर्विद्या देख आश्चर्य में पड़ गए। वे उस महान धुनर्धर को खोजते-खोजते एकलव्य के आश्रम पहुंचे और देखा की एकलव्य ऐसे बाण चला रहा है जो कोई चोटी का योद्धा भी नहीं चला सकता। ये बात द्रोणचार्य के लिए चिंता का विषय बन गई। उन्होंने एकलव्य से उसके गुरु के बारे में जानने की जिज्ञासा दिखाई तो एकलव्य ने उन्हें वो प्रतिमा दिखा दी। उन्हें यह जानकर और भी आश्चर्य हुआ कि द्रोणाचार्य को मानस गुरु मानकर एकलव्य ने स्वयं ही अभ्यास से यह विद्या प्राप्त की है।

अपनी प्रतिमा को देख आचार्य द्रोण ने कहा कि अगर तुम मुझे ही अपना गुरु मानते हो तो मुझे गुरु दक्षिणा दो। एकलव्य ने अपने प्राण तक देने की बात कर दी। गुरु दक्षिणा में गुरु द्रोण ने अंगूठे की मांग की जिससे कहीं एकलव्य सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर ना बन जाए अगर ऐसा हुआ तो अर्जुन को महान धनुर्धर बनाने का वचन झूठा हो जाएगा। एकलव्य ने बिना हिचकिचाहट अपना अंगूठा गुरु को अर्पित कर दिया, वह एक महान शिष्य था।