आज भी सभी के दिल में जिंदा हैं ‘शोले’ के ठाकुर : संजीव कुमार की बरसी पर खास

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अपने दमदार अभिनय से हिंदी सिनेमा जगत में खास पहचान बनाने वाले संजीव कुमार को जोधपुर में एक नये कलाकार के रूप में दस दिन तक अपनी बारी का इंतजार करने के बाद वापस मुंबई लौट जाने को कहा गया।

संजीव कुमार की बरसी पर जानिए उनसे जुड़ी खास बातें
संजीव को करियर के शुरुआती दिनों में वह दिन भी देखना पड़ा जब उन्हें फिल्मों में नायक के रूप में काम करने का अवसर नहीं मिलता था।

गुरुदत्त की असमय मौत के बाद निर्माता निर्देशक के आसिफ ने अपनी फिल्म ‘लव एंड गॉड’ का निर्माण बंद कर दिया और अपनी नई फिल्म ‘सस्ता खून मंहगा पानी’ के निर्माण में जुट गए।

राजस्थान के खुबसूरत नगर जोधपुर में फिल्म की शूटिंग के दौरान संजीव कुमार एक नए कलाकार के रूप में अपनी बारी का इंतजार लगभग दस दिन तक करते रहे तथा तथा बाद में के. आसिफ ने उसे वापस मुंबई लौट जाने को कहा। यह सुनकर उसके आंखों में आंसू आ गए।

जिसने वापस लौट जाने को कहा था उसने ही वापस बुलाया

गुरूदत्त की मौत के बाद के.आसिफ अपनी फिल्म के लिए एक ऐसे अभिनेता की तलाश में थे जिसकी आंखे भी रूपहले पर्दे पर बोलती हो और वह अभिनेता के रूप में संजीव कुमार उन्हें मिल गया।

उन्होंने जिस लड़के को जोधपुर से वापस मुंबई लौटने के लिए कहा था वही बाद में फिल्म उद्योग में संजीव कुमार के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

बचपन से ही बनना चाहते थे नायक
मुंबई में 9 जुलाई 1938 को एक मध्यम वर्गीय गुजराती परिवार में जन्मे संजीव कुमार बचपन से ही फिल्मों में नायक बनने का सपना देखा करते थे।

इस सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने एक्टिंग स्कूल में दाखिला लिया। वर्ष 1962 में राजश्री प्रोडक्शन की निर्मित फिल्म आरती के लिए उन्होंने स्क्रीन टेस्ट दिया जिसमें वह पास नहीं हो सके।

फिल्म ‘निशान’ में पहली बार निभाया लीड रोल
संजीव कुमार को सर्वप्रथम मुख्य अभिनेता के रूप में उन्हें 1965 में प्रदर्शित फिल्म ‘निशान’ में काम करने का मौका मिला।

साल 1960 से 1968 तक संजीव कुमार फिल्म उद्योग में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करते रहे। फिल्म हम हिंदुस्तानी के बाद उन्हें जो भी भूमिका मिली वह उसे स्वीकार करते चले गए। इस बीच उन्होंने ‘स्मगलर पति-पत्नी’, ‘हुस्न और इश्क’, ‘बादल’, ‘नौनिहाल’ और ‘गुनहगार’ जैसी कई बी स्तर की फिल्मों में अभिनय किया लेकिन इनमें से कोई भी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हो सकी।

लीड रोल में ना होकर भी अपने अभिनय की छाप छोड़ी
साल 1968 मे प्रदर्शित फिल्म ‘शिकार’ में संजीव कुमार पुलिस ऑफिसर की भूमिका में दिखाई दिए। यह फिल्म पूरी तरह अभिनेता धर्मेन्द्र पर केन्द्रित थी फिर भी संजीव अपने अभिनय की छाप छोड़ने में कामयाब रहे। इस फिल्म में दमदार अभिनय के लिए उन्हें सहायक अभिनेता का फिल्म फेयर पुरस्कार भी मिला।

1970 तक बनाई नायक के रूप में पहचान
साल 1970 में प्रदर्शित फिल्म ‘खिलौना’ की जबरदस्त कामयाबी के बाद संजीव कुमार ने नायक के रूप में अपनी अलग पहचान बना ली। साल 1970 में ही प्रदर्शित फिल्म ‘दस्तक’ में लाजवाब अभिनय के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

गूंगे के किरदार ने भी दोबारा दिलाया राष्ट्रीय पुरस्कार
साल1972 मे प्रदर्शित फिल्म ‘कोशिश’ में उनके अभिनय का नया आयाम दर्शकों को देखने को मिला। इस फिल्म में गूंगे की भूमिका निभाना किसी भी अभिनेता के लिए बहुत बड़ी चुनौती थी। बगैर संवाद बोले सिर्फ आंखो और चेहरे के भाव से दर्शकों को सब कुछ बता देना संजीव कुमार की अभिनय प्रतिभा का ऐसा उदाहरण था जिसे शायद ही कोई अभिनेता दोहरा पाए। इस फिल्म में उनके लाजवाब अभिनय के लिए उन्हें दूसरी बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया।

हर रोल के लिए हमेशा तैयार रहते
संजीव कुमार के अभिनय की खासियत यह रही कि वह किसी भी तरह की भूमिका के लिए सदा तैयार रहते थे। फिल्म ‘कोशिश’ में गूंगे की भूमिका हो या फिर ‘शोले’ में ठाकुर या सीता और गीता और नया दिन नई रात में अपनी भूमिका को उन्होंने इतनी खूबसूरती से निभाया जैसे वह उन्हीं के लिए बनी हो।

‘शोले’ ने दी खास पहचान
अभिनय में एकरूपता से बचने और स्वयं को चरित्र अभिनेता के रूप में भी स्थापित करने के लिए संजीव कुमार ने अपने को विभिन्न भूमिकाओं में पेश किया। इस क्रम में 1975 में प्रदर्शित रमेश सिप्पी की सुपरहिट फिल्म ‘शोले’ में वह फिल्म अभिनेत्री जया के ससुर की भूमिका निभाने से भी नहीं हिचके।

संजीव कुमार दो बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किए गए हैं। अपने दमदार अभिनय से दर्शकों में खास पहचान बनाने वाला यह अजीम कलाकार 6 नवंबर 1985 को इस दुनिया को अलविदा कह गया।

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