हिन्दू धर्म के लोगों को सिर पर चोटी क्यों रखनी चाइये ? जानिए इसके पीछे का वैज्ञानिक कारण

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सिख, बौद्ध, जैन और अन्य धर्मों के अनुसार हिन्दू धर्म के भी अपने कुछ रीति रिवाज व नियम हैं। जैसे भी धर्म में कुछ नियम परंपराओं व मान्यताओं के आधार पर होते हैं और कुछ नियम वैज्ञानिक महत्व के कारण वैसे ही हिन्दू धर्म में भी कुछ नियम हैं। चूंकि हिन्दू धर्म विभिन्न वर्गों और समूहों में बंटा है में जरूरत और परंपरा के अनुसार, इन समूहों के नियम भी एक दूसरे से थोड़ी अगल होते हैं। जैसे पूजा, कर्मकांड, और यज्ञ आदि से कार्य कराने वालों को चोटी रखना अनिवार्य माना गया है तो कुछ समूह लिए उसकी इच्छा पर निर्भर है।

जब हम किसी को चोटी रखे देखते हैं तो उसे पुरानी सोच वाला या कट्टर सोच का व्यक्ति मान लेते हैं। लेकिन यह बहुत कम लोगों को ही पता होगा कि चोटी रखने का सुश्रुत संहिता में चोटी रखने का कारण, महत्व और एक पूरा नियम है। यहां चोटी के महत्व और उसके वैज्ञानिक कारण के बारे में बताया गया है। सुश्रुत संहिता में यह भी बताया गया है किकि चोटी सिर पर कहां और कितनी रखनी चाहिए।

चोटी रखने के वैज्ञानिक कारण-

बच्चे का जब पहले साल के अंत, तीसरे साल या पांचवें साल में जब मुंडन किया जाता है तो सिर में थोड़ी बाल रख दिए जाते है जिसे चोटी कहते हैं। इस कार्य को मुंडन संस्कार कहते हैं। सिर पर शिखा या चोटी रखने का संस्कार यज्ञोपवित या उपनयन संस्कार में भी किया जाता है। सिर के जिस स्थान पर चोटी रखी जाती है उसे सहस्त्रार चक्र कहते हैं। माना जाता है कि इस चर्क के नीचे ही मनुष्य की आत्मा निवास करती है। विज्ञान के अनुसार, यह स्थान मंस्तिस्क केंद्र होता है। यहां से ही बुद्धि, मन, और शरीर के अंगों को नियंत्रित किया जाता है।

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जानकारों का मानना है कि इस स्थान पर चोटी रखने से मस्तिष्क का संतुलन बना रहता है। शिखा रखने से इस सहस्रार चक्र को जागृत करने और शरीर, बुद्धि व मन पर नियंत्रण करने में सहायता मिलती है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार सहस्रार चक्र का आकार गाय के खुर के समान होता है इसीलिए चोटी भी गाय के खुर के बराबर ही रखी जाती है।

चोटी रखने का महत्व

सुश्रुत संहिता में लिखा है कि मस्तक ऊपर सिर पर जहां भी बालों का आवृत (भंवर) होता है, वहां सम्पूर्ण नाडिय़ों व संधियों का मेल होता है। इस स्थान को ‘अधिपतिमर्म’ कहा जाता है। इस स्‍थान पर चोंट लगने पर मनुष्य की तत्काल मौत हो जाती है।

सुषुम्ना के मूल स्थान को ‘मस्तुलिंग’ कहते हैं। मस्तिष्क के साथ ज्ञानेन्द्रियों-कान, नाक, जीभ, आंख आदि का संबंध है और कर्मेन्द्रियों-हाथ, पैर, गुदा, इंद्रिय आदि का संबंध मस्तुलिंगंग से है। मस्तिष्क मस्तुलिंगंग जितने सामर्थ्यवान होते हैं, उतनी ही ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों की शक्ति बढ़ती है। माना जाता है कि मस्तिस्क को ठंडक की जरूरत होती है। जिसके लिए क्षौर कर्म और गोखुर के बराबर शिखा रखनी जरूरी होती है।

कुछ धार्मिक लेखों में यहां तक कहा गया है कि अगर व्यक्ति में अज्ञानता में या फैशन में आकर चोटी रखता है तो उसे फायदे से ज्यादा नुकसान हो सकता है। इसी चोटी किसी जानकार की सलाह के आधार पर ही रखना चाहिए।

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