सदियों से इस देश के निवासी मानव लिंग (Penis) की पूजा करते आ रहे हैं….

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कई सदियों से हमारे पड़ोसी देश, भूटान के निवासी मानव लिंग या कहें ‘Penis’ की पूजा करते आ रहे हैं। सुनने में ये अजीब ज़रूर लगेगा, लेकिन अगर आप वहां गए हैं तो दीवारों पर मानव लिंग की पेंटिंग और ग्राफिटी दिखना आम बात है। ये पेंटिंग्स प्राचीन बौद्ध परंपरा की साक्षी हैं। कुछ लिंग छोटे हैं, तो कुछ बड़े, तो कुछ बहुत ही भयावह!



इन लिंगों को अलग-अलग चटकदार रंगों में भी पेंट किया जाता है। कुछ में तो तोहफ़े की तरह रिबन लगे होते हैं, लेकिन इन सारी पेंटिंग्स में जो एक समान बात है वो ये है कि ये सारे लिंग खड़े हुए हैं! कहा जाता है कि लिंग की प्रतिमा बुरी आत्माओं को दूर रखती है और द्वेष भावना से बचाती है। धारणा ये भी है कि ऐसी पेंटिंग्स उर्वरता को बढ़ाती हैं।

आखिर क्या संबंध है बौद्ध धर्म और इन पेंटिंग्स का?

दृक्पा कुंले नाम का एक विचित्र बौद्ध भिक्षु भूटान आया था जो कि मदिरापान, महिलाओं के साथ यौन संबंध और कामुकता में लिप्त था। इन तिरस्कारी तरीकों से वो गैर मठ-संबंधी बौद्ध धर्म का तात्पर्य समझाता था। उसके इन कारनामों की वजह से कई पौराणिक कथाएं भी बन चुकी हैं।

दृक्पा कुंले के किस्से और भी विवादस्पद हुआ करते थे। वो कहता था कि ‘घड़े की तली में सबसे अच्छी मदिरा होती है और जीवन का असली आनंद नाभि के नीचे ही मिलता है’।

सामाजिक रीतियों को न मानने वाला दृक्पा खुद को ‘क्यिशोदृक का पागल’ कहता था।

‘उर्वरता का संत’ कहलाने वाला ये भिक्षु कई दिनों तक मदिरा के नशे में कुंवारी कन्याओं के साथ यौन संबंध बनाने में बिता देता था।

दृक्पा अपरंपरागत बौद्ध धर्म का प्रचार करता था जिसमें वो सामान्य जन का ज्ञानोदय करता था, खासकर महिलाओं का। उसने अपने अनुचरों को शिक्षा दी थी कि मनुष्य को सांसारिक तृष्णा से दूर रहना चाहिए और सादा जीवन व्यतीत करने का अनुसरण करना चाहिए। सादे जीवन से उसका मतलब था कि आध्यात्म की खोज और कामुकता की उदारता। दृक्पा आशीर्वाद के रूप में भक्तों के साथ संभोग करता था।

भूटान के पश्चिमी भाग में कुछ लोग अभी भी ऐसी जीववादी प्रथाओं को मानते हैं।
एक प्रथा के अनुसार ‘Lhabon’ (या देवों का उद्यम) मेले में एक समुदाय ऐसी सीढ़ी का उपयोग करता है जो कि लिंग के आकार की होती है। पौराणिक कथाओं में लिखा है कि देव रस्सी के सहारे इस सीढ़ी से नीचे आकर आरोग्यता और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।

कई नि: संतान दंपति हर साल Chimi Lhakhang जो कि एक ‘उर्वरता मठ’ है, तीर्थ करने जाते हैं। यहां बौद्ध भिक्षु उन्हें आशीर्वाद में लकड़ी का लिंग देता है।

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