इस मेले से लड़कियों को लेकर भाग जाते हैं लड़के

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मध्य प्रदेश में आदिवासी समुदाय के प्रेम, उल्लास और मिलन का पर्व भगोरिया 16 मार्च से शुरू हो गया है। यह पर्व अगले एक सप्ताह तक चलेगा। इस दौरान साप्ताहिक हाट बाजारों में भगोरिया मेले लगेंगे। इन मेलों में लड़के मनपसंद हमसफर की तलाश करते हैं। पसंद आने पर वे लड़की को पान खिलाते हैं या गुलाल लगाते हैं। अगर लड़की ने भी उसी अंदाज में लड़के गाल पर गुलाल लगा दिया, तो लड़का और लड़की मेले से भाग जाते हैं। भागने की वजह से ही इसे ‘भगोरिया पर्व’ कहा जाता है। भागने के कुछ दिनों बाद आदिवासी समाज उन जोड़ों को पति-पत्नी के रूप में मान्यता दे देता है।



अब प्रदेश के झाबुआ, धार, खरगोन, अलीराजपुर जैसे आदिवासी बाहुल्य जिलों में आदिवासी युवाओं सिर इश्क का जादू सर चढ़कर बोलेगा। हालांकि, कई जगह इसकी शुरूआत महाशिवरात्रि के मौके पर गंगा महादेव की घाटी में मांदल की थाप गूंजने के साथ ही हो गई थी, क्योंकि धार के तिरला अंचल के युवक-युवतियां यहां गंगा महादेव की घाटी में पानी के बीच अठखेलियां करते हुए दिखाई दिए थे।

भगोरिया एक उत्सव है, जो होली का ही एक रूप है। इसका दूसरा नाम भोगया भी है। यह मध्य प्रदेश के मालवा अंचल धार, झाबुआ, खरगोन आदि के आदिवासी इलाकों में बेहद धूमधाम से मनाया जाता है। झाबुआ जिले के कुल 36 हाट बाजारों में यह मेले देखने को मिलेंगे।

स्थानीय लोगों की मानें तो राजा भोज के समय लगने वाले हाट-बाजारों को भगोरिया कहा जाता था। इस समय दो भील राजाओं कासूमार औऱ बालून ने अपनी राजधानी भागोर में विशाल मेले औऱ हाट का आयोजन करना शुरू किया। धीरे-धीरे आस-पास के भील राजाओं ने भागोर की तर्ज पर इन मेलों अपने क्षेत्रों में शुरू किया, इस वजह से इनका नाम भगोरिया पड़ा। वहीं, दूसरी ओर वहां के कुछ लोगों का मानना है कि इन मेलों में युवक-युवतियां अपनी मर्जी से भागकर शादी करते हैं, इसलिए इसे भगोरिया कहा जाता है।

भगोरिया मेलों में हजारों आदिवासी समाज के लोग परंपरागत वेशभूषा में परंपरागत वाद्य यंत्रों के साथ आकर अपनी प्रस्तुति देंगे। वाद्य यंत्रों यानि ढोल-मांदल और बांसुरी के साथ साथ घुंघरुओं की आवाज मेलों में सुनाई देगी। भगोरिया मेले होलिका दहन के ठीक एक दिन पहले तक लेगेंगे।

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