जानिये सूर्य नमस्कार का रहस्य , जानकर रोज करेंगे आप सूर्य नमस्कार

सूर्य देव की और अपना मुख कर के सूर्य नमस्कार किया जाता है | जिससे सूर्य की किरणों का सीधा प्रभाव साधक पर पड़ता है |सूर्य नमस्कार सभी योगासनों में सबसे श्रेष्ट है। इस अकेले  अभ्यास से ही साधक को सम्पूर्ण योग व्यायाम का लाभ पहुंचता है। इसके अभ्यास से साधक का शरीर स्वस्थ होकर तेजस्वी हो जाता है। ‘सूर्य नमस्कार’ स्त्री, पुरुष, युवा, बाल तथा वृद्धों सभी के लिए भी उपयोगी बताया गया है।सूर्य देव की और अपना मुख कर के सूर्य नमस्कार किया जाता है | जिससे सूर्य की किरणों का सीधा प्रभाव साधक पर पड़ता है |सूर्य नमस्कार सभी योगासनों में सबसे श्रेष्ट है। इस अकेले  अभ्यास से ही साधक को सम्पूर्ण योग व्यायाम का लाभ पहुंचता है। इसके अभ्यास से साधक का शरीर स्वस्थ होकर तेजस्वी हो जाता है। ‘सूर्य नमस्कार’ स्त्री, पुरुष, युवा, बाल तथा वृद्धों सभी के लिए भी उपयोगी बताया गया है।

संस्कृत का एक श्लोक है की …..

आदित्यस्य नमस्कारन् ये कुर्वन्ति दिने दिने।

आयुः प्रज्ञा बलम् वीर्यम् तेजस्तेशान् च जायते ॥

{अर्थात जो लोग प्रतिदिन सूर्य नमस्कार करते हैं, उनकी आयु, प्रज्ञा, बल, वीर्य और तेज बढ़ता है}

गजब दुनिया

1.सर्वप्रथम सीधे खड़े हो जाइए, फिर दोनों हाथों को, पंजों को नमस्कार की मुद्रा में जोड़कर अंगूठों को कंठ कपूर से लगाइए। तदनंतर दोनों नासापुटों से धीमे धीमे श्वास अंदर खींचिए। श्वास को पूरा भर लीजिए। फिर दोनों हाथों को ऊपर की ओर लेकर  जाइए। शरीर के ऊपरी भाग को तानकर पीछे की ओर इतना ही झुकाइए कि जिससे पीछे की ओर गिरने की संभावना न रहे । वक्षस्थल का तनाव आगे की ओर होना चाहिए।

2.इसके पश्चात् ऊपर की ओर ताने हुए हाथों को सीधे करते हुए पीछे की ओर तने हुए शरीर के भाग को भी सीधा कर लें फिर धीरे-धीरे दोनों हाथों को समान रूप से नीचे की ओर लाते हुए अपने शरीर को खड़े-खड़े इस प्रकार दोहरा कर लें कि हाथों की उंगलियां पैरों के पंजों का स्पर्श करने लगें। अपनी नाक को दोनों जांघों के मध्य में रखें।


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3.सूर्य नमस्कार सर्वांगासन ही है। इसको करने से सभी अंगों का व्यायाम होता है। किसी योग्य शिक्षक द्वारा इसको सीखकर पूर्ण सूर्य नमस्कार किया जाए तो बहुत से आसन करने की बिलकुल भी आवश्यकता नहीं रहती।

4.सूर्य नमस्कार शरीर को पूर्ण रूप से शांति प्रदान करता है और मानसिक उत्तेजना और मस्तिष्क का तनाव भी दूर करता है। शरीर के पृष्ठ भाग में रहने वाली अकडऩ दूर होती है। समस्त शरीर को समान रूप से स्वस्थ रखने में सहायक सिद्ध होता है। इसके परिणामस्वरूप सूर्य की किरणें रोगी के फुफ्फुसों में जाकर उसके अत्यधिक रोगों को नष्ट करती हैं। इस क्रिया से शरीर और मन दोनों ही स्वस्थ रहते हैं।

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5.सूर्य नमस्कार का क्या महत्व है?प्रत्येक पदार्थ चाहे वह जड़ हो या चेतन, ऊर्जा का ही एक रूप है और उसकी परिणति भी ऊर्जा में ही होनी है। इतनी ही नहीं उसके जीवन काल के विकास के लिए आवश्यक क्रिया शक्ति भी ऊर्जा से ही प्राप्त होती है। ब्रह्मांड में ऊर्जा का अप्रतिम स्रोत एक मात्र सूर्य ही है। अत: समस्त विश्व का आधार सूर्य है। सूर्य सोचने-समझने एवं क्रिया करने की शक्ति प्रदान करता है। अगर किसी प्रकार मनुष्य सूर्य से सीधा संबंध स्थापित करके उसकी शक्ति को अपने भीतर भरने की साधना प्राप्त कर सके तो नि:संदेह उसका शरीर रूपांतरित होते हुए दिव्यता की उस स्थिति को प्राप्त कर लेगा जहां काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, रोग, मृत्यु आदि का भय नहीं रहता। जैसे की ऊपर श्लोक में बताया गया है |

6.सूर्य साधना से लाभ उठाने के लिए सूर्य में पूर्ण श्रद्धा और विश्वास का होना आवश्यकता है। नेत्र के रोगी, मस्तिष्क शोधन, पेट के रोगों आदि से छुटकारा, कान, नाक, गले आदि की समस्याओं तथा त्वचा रोगों में सुधार, माइग्रेन, डिप्रैशन, तनाव, अनिद्रा का निवारण, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, मधुमेह के रोगों में भी बहुत लाभ प्राप्त होता है। धर्मशास्त्रों में रोग निवृत्ति के लिए सूर्य की पूजा, सूर्य उपवास और सूर्य नमस्कार के प्रयोग दिए गए हैं।

सूर्य नमस्कार के लिए रवि का ध्यान करें और उनके नामों को लेते हुए नमस्कार करें-ऊँमित्राय नम:।ऊँसूर्याय नम:।ऊँ खगाय नम:।ऊँहिरण्य गर्भाय नम:।ऊँ आदित्याय नम:।ऊँअर्काय नम:।ऊँ रवये नम:।ऊँ मानवे नम:।ऊँ पूष्णे नम:।ऊँ मरीचये नम:।ऊँ सावित्रे नम:।ऊँभास्कराय नम:।

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कर्म के साक्षी अरुण हैं अत: उन्हें नमस्कार करना चाहिए। अरुण विनता के पुत्र हैं, कर्म के साक्षी हैं, सात घोड़ों को सात लगामों से पकड़े हैं, इससे वह प्रसन्न होते हैं।
बारह सूर्य अंशुमान, अर्यमन, इंद्र, त्वष्टा, धातु, पर्जन्य, पूषण, भग, मित्र, वरुण, वैवस्वत्, विष्णु।

 

सूर्य नमस्कार के मन्त्र और चक्र ~               मन्त्र               चक्            आसन        बीज  नमस्कार1 ॐ ह्रां ॐ मित्राय नमः अनन्तचक्र        प्रणामासन2 ॐ ह्रीं ॐ रवये नमः विशुद्धिचक्र हस्तोत्थानासन3 ॐ ह्रूं ॐ सूर्याय नमः स्वाधिष्ठानचक्र हस्तपादासन4 ॐ ह्रैं ॐ भानवे नमः आज्ञाचक्र        एकपादप्रसारणासन5 ॐ ह्रौं ॐ खगाय नमः विशुद्धिचक्र दण्डासन6 ॐ ह्रः ॐ पूष्णे नमः मणिपुरचक्र अष्टाङ्गनमस्कारासन7 ॐ ह्रां) ॐ हिरण्यगर्भाय नमः स्वाधिष्ठानचक्र भुजङ्गासन8 ॐ मरीचये नमः विशुद्धिचक्र अधोमुखश्वानासन9 ॐ ह्रूं ॐ आदित्याय नमः आज्ञाचक्र        अश्वसंचालनासन10 ॐ ह्रैं ॐ सवित्रे नमः स्वाधिष्ठानचक्र उत्थानासन11 ह्रौं ॐ अर्काय नमः विशुद्धिचक्र हस्तोत्थानासन12 ॐ ह्रः ॐ भास्कराय नमः अनन्तचक्र         प्रणामासन

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