अबुल हसन और हारूँ रशीद की प्रेयसी शमसुन्निहर की कहानी – अलिफ लैला (Abul Hasan Haru Rashid Shamsunnihar Story Hindi – Alif Laila)

मसरूर बीस दासों के साथ आया और शमसुन्निहार को झुक कर अभिवादन करने के बाद बोला कि खलीफा आपके विरह में व्याकुल हैं और आपसे भेंट के लिए बड़े इच्छुक हैं। शमसुन्निहार ने खुश हो कर कहा, यह तो मेरा बड़ा भाग्य है कि वे कृपा करना चाहते हैं। मैं तो उनकी दासी हूँ। जब चाहें आएँ। लेकिन मसरूर साहब, आप कुछ देर लगा कर ही उन्हें लाएँ। कहीं ऐसा न हो कि जल्दी में खलीफा के स्वागत के प्रबंध में कुछ त्रुटि रह जाए।

यह कह कर शमसुन्निहार ने मसरूर और उसके सेवकों को विदा किया और खुद आँखों में आँसू भर कर शहजादे के पास आई। व्यापारी उसे आँसू बहाते देख कर घबराया कि कहीं ऐसा न हो कि भेद खुल गया हो। शहजादा भी प्रेम-मिलन में यह अचानक व्याघात देख कर अत्यंत दुखी हो कर आहें भरने लगा। इतने ही में एक विश्वसनीय दासी ने शमसुन्निहार से कहा कि आप बैठी क्या कर रही हैं, नौकर-चाकर आने लगे हैं और खलीफा किसी भी समय आ सकते हैं। शमसुन्निहार ने सर्द आह खींच कर कहा कि भगवान भी कैसा निर्दयी है कि मिलन होते ही विरह का दुख हम पर डाल दिया। यह कह कर उसने दासी से कहा, इन दोनों को ले जा कर उस मकान में रखो जो बाग के दूसरे कोने पर है। इन्हें बिठा कर मकान में ताला लगा देना। फिर अवसर पाने पर इन्हें मकान के गुप्त द्वार से निकाल कर दजला नदी के किनारे ले जा कर नाव पर बिठा देना।

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