अबुल हसन और हारूँ रशीद की प्रेयसी शमसुन्निहर की कहानी – अलिफ लैला (Abul Hasan Haru Rashid Shamsunnihar Story Hindi – Alif Laila)

दासियों ने दौड़ कर दोनों को सँभाला और बेदमुश्क का अरक छिड़क कर दोनों को चैतन्य किया। शमसुन्निहार ने होश में आते ही पूछा कि व्यापारी कहाँ है। व्यापारी बेचारा अपनी जगह बैठा काँप रहा था। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि इस कांड की परिणति कहाँ होगी और खलीफा को यह हाल मालूम हो जाएगा तो क्या होगा। शहजादे ने आ कर कहा कि शमसुन्निहार तुम्हें बुलाती है तो वह उठ कर उसके पास आया। शमसुन्निहार ने उससे कहा कि मैं आप की बड़ी आभारी हूँ कि आप ने शहजादे से मेरा मिलन करवा दिया। व्यापारी ने कहा, मुझे यह आश्चर्य है कि आप लोग एक-दूसरे से मिलन होने पर भी इतने विह्वल क्यों हैं। शमसुन्निहार ने कहा कि सच्चे प्रेमियों की यही दशा होती है, उन्हें वियोग का दुख तो सालता ही है, मिलन में भी उनकी व्याकुलता कम नहीं होती।

यह कहने के बाद शमसुन्निहार ने दासियों को भोजन लाने की आज्ञा दी। शमसुन्निहार, शहजादे और व्यापारी ने रुचिपूर्वक भोजन किया। फिर शमसुन्निहार ने शराब का प्याला उठाया और एक गीत गा कर उसे पी गई। दूसरा प्याला उसने शहजादे को दिया। उसने भी एक गीत गा कर प्याला पी लिया।

यह आनंद मंगल हो ही रहा था कि एक दासी ने धीरे से कहा कि खलीफा का प्रधान सेवक मसरूर खलीफा का संदेश लाया है और आपकी प्रतीक्षा में खड़ा है। शहजादा और व्यापारी यह बात सुन कर बड़े भयभीत हुए और उनके मुँह पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। शमसुन्निहार ने उन्हें धीरज बँधाया और दासी से कहा कि तुम मसरूर को कुछ देर बातों में उलझाओ ताकि मैं शहजादे को छुपा सकूँ, मैं शहजादे को छुपा लूँगी तो मसरूर को बुलाऊँगी। वह दासी गई तो शमसुन्निहार ने आज्ञा दी कि बारहदरी के दरवाजे बंद कर दो और बाग की तरफ लगे बड़े परदे गिरा दो ताकि रोशनी न आए। फिर उसने शहजादे और व्यापारी को बारहदरी के ऐसे कोने में बिठा दिया जहाँ से वे किसी को दिखाई न दें। यह सब कर के उसने पूर्ववत गाने-बजाने वालियों को कला प्रदर्शन की आज्ञा दी और आदेश दिया कि मसरूर को अंदर लाया जाए।

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