अबुल हसन और हारूँ रशीद की प्रेयसी शमसुन्निहर की कहानी – अलिफ लैला (Abul Hasan Haru Rashid Shamsunnihar Story Hindi – Alif Laila)

इसके बाद वही विश्वस्त दासी इन लोगों को एक अति सुंदर बारहदरी में ले गई। उसकी छत गुंबद की तरह थी और उसमें रत्न जड़े थे। सामने की ओर संगमरमर के दो विशाल खेमे थे जिनमें नीचे की ओर भाँति-भाँति के पशु-पक्षियों के सुंदर रंगों में मनोहारी चित्र बने थे। बारहदरी के फर्श पर भी तरह-तरह के फूल-बूटों के चित्र बने थे। एक ओर नाजुक-सी दो अल्मारियाँ रखी थीं। जिनमें चीनी, बिल्लौर, संगमूसा आदि के अत्यंत सुंदर पात्र रखे हुए थे। उन पात्रों पर सोने के पानी से बड़े सुंदर चित्र बने थे और सुलेख लिखे हुए थे। दूसरी ओर के खंभों में दरवाजे लगे थे। जिसके बाद बरामदा था। बरामदे के बाद बाग था। बाग की जमीन पर भी रंगीन पत्थर जड़े हुए थे। बारहदरी के दोनों ओर दो सुंदर और बड़े हौज थे जिनमें सैकड़ों फव्वारे छूट रहे थे। बाग में बीसियों तरह के पक्षी वृक्षों पर बैठे चहचहा रहे थे।

यह लोग उस अनुपम शोभा का आनंद ले ही रहे थे कि बहुत-सी दासियाँ जो सुंदर वस्त्राभूषण पहने थीं आईं और बारहदरी में बिछी हुई सुनहरे काम की चौकियों पर बैठ गईं और तरह-तरह के वाद्ययंत्र अपने सामने रख कर उन्हें ठीक करने लगीं ताकि आज्ञा मिलते ही गाना-बजाना शुरू कर दें। यह दोनों भी ऐसे स्थान पर बैठ गए जहाँ से सब कुछ देख सकें। उन्होंने देखा कि एक ओर ऊँची रत्नजटित चौकी रखी है। व्यापारी ने शहजादे से चुपके से कहा, अनुमानतः यह बड़ी चौकी स्वयं शमसुन्निहार के बैठने के लिए है। यह महल खलीफा के राजप्रासाद ही का एक भाग है किंतु इसे विशेष रूप से शमसुन्निहार के लिए बनवाया गया है। कारण यह है कि खलीफा के महल में जितनी दासियाँ और सेविकाएँ हैं उनमें वह सब से अधिक शमसुन्निहार ही को चाहता है। शमसुन्निहार को अनुमति है कि जहाँ चाहे खलीफा से पूछे बगैर चली जाए। खलीफा स्वयं भी जब इसके पास आना चाहता है तो पहले से संदेश भिजवा कर आता है। वह अभी आती ही होगी।

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