अबुल हसन और हारूँ रशीद की प्रेयसी शमसुन्निहर की कहानी – अलिफ लैला (Abul Hasan Haru Rashid Shamsunnihar Story Hindi – Alif Laila)

यह सुन कर दासी भी सिर पीट-पीट कर रोने लगी। बाद में दासी ने कहा, अब शमसुन्निहार भी इस दुनिया में नहीं है। खलीफा ने उसे पकड़वा मँगाया तो उसने खलीफा के सामने स्वीकार कर लिया कि वह अबुल हसन के प्रेम में पागल है। अबुल हसन का नाम लेने के साथ ही वह इस तरह तड़पने और छटपटाने लगी कि उसके सच्चे प्रेम से खलीफा भी प्रभावित हुआ और उसके हृदय में क्रोध के बजाय सहानुभूति जागृत हो गई। उसने शमसुन्निहार को गले लगाया और बहुत कुछ भेंट और पारितोषक दे कर उसे विदा किया। उसने अपने महल में आ कर मुझसे कहा कि तूने मेरे साथ बड़ा उपकार किया है किंतु मैं भी अब दो घड़ी की मेहमान हूँ। मैंने उसे धैर्य दिया और कहा ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए। शाम को खलीफा फिर उसके पास आया और गाना-बजाना शुरू हुआ किंतु प्रेम-संगीत ने उसकी दशा खराब कर दी और वह मर गई।

खलीफा ने पहले तो उसे बेहोश समझा और उसे होश में लाने के बहुत प्रयत्न करवाता रहा किंतु जब निश्चय हुआ कि वह मर गई तो उसने शोक में आज्ञा दी कि समस्त वाद्य-यंत्र तोड़ दिए जाएँ। अब उस सभा में संगीत के बदले रुदन के स्वर उठने लगे। खलीफा खुद भी वहाँ अधिक न बैठ सका और अपने महल को चला गया। मैं रात भर स्वामिनी के शव के पास बैठी रही। सुबह मैंने लाश को नहलाया और महल के अंदर बड़े मकबरे में, जहाँ दफन होने की अनुमति शमसुन्निहार ने पहले ही खलीफा से ले ली थी, दफन किया। अब मैं चाहती हूँ कि जब शहजादे की लाश आए तो उसे भी स्वामिनी की कब्र के बगल में गाड़ा जाए ताकि दोनों प्रेमी मर कर तो एक जगह रहें।

जौहरी ने कहा कि खलीफा की अनुमति के बगैर यह कैसे संभव है। दासी ने कहा, इसकी चिंता न करें। खलीफा ने मुझसे कहा कि तू हमेशा उसकी वफादार रही, अब मरने के बाद भी उसकी सेवा में रह और उसकी कब्र की देखभाल कर। खलीफा ने मुझे वहाँ का सारा अधिकार दे दिया है। वैसे भी उसे शहजादे और शमसुन्निहार के प्रेम का हाल मालूम है और वह इस प्रसंग से नाराज भी नहीं है।

जब शहजादे की लाश बगदाद पहुँची तो जौहरी ने उस दासी को इसकी सूचना भिजवाई। वह आ कर शहजादे की लाश को शहजादे की माता की अनुमति ले कर महलवाले मकबरे में ले गई। शहजादे की शवयात्रा में हजारों आदमी शामिल थे। अंततः शहजादे को भी अपने प्रेयसी के बगल में दफन कर दिया गया। तब से दूर-दूर के देशों से लोग आ कर उनकी कब्रों पर मनौती मानते हैं।

शहरजाद ने यह कथा समाप्त की तो उसकी बहन दुनियाजाद ने कहा कि यह कहानी बहुत ही सुंदर थी, क्या तुम्हें और भी कोई कहानी आती है। शहरजाद बोली, यदि मुझे आज प्राणदंड न मिला तो मैं कल शहजादा कमरुज्जमाँ की कहानी सुनाऊँगी। बादशाह शहरयार ने नई कहानी सुनने के लालच में उस दिन भी शहरजाद का वध नहीं करवाया और अगली सुबह के पूर्व शहरजाद ने नई कहानी आरंभ कर दी।

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