अबुल हसन और हारूँ रशीद की प्रेयसी शमसुन्निहर की कहानी – अलिफ लैला (Abul Hasan Haru Rashid Shamsunnihar Story Hindi – Alif Laila)

अब जौहरी को कुछ और ही शक हुआ कि यह आदमी इतना कृपालु क्यों है। उसने सोचा कहीं ऐसा तो नहीं कि खलीफा ने हम लोगों की गिरफ्तारी के लिए इनामी इश्तिहार दिया हो और यह इनाम के लालच में हमें पकड़वाना चाहता हो। उसने कहा, आपकी कृपा के लिए धन्यवाद किंतु बीमारी और भूख से मेरे साथी की हालत खराब हो गई है और वह चलने-फिरने के योग्य नहीं है। उस भले आदमी ने एक नौकरानी से उन दोनों के लिए कुछ खाना भी भिजवा दिया। जौहरी ने पेट भर खाना खा लिया।

किंतु शहजादे की हालत वास्तव में खराब थी। उससे एक कौर भी नहीं खाया गया। उसने समझ लिया कि मेरा अंत समय आ गया है और वह जौहरी से बोला, भाई, अब मैं बच नहीं सकता तुम देख ही रहे हो कि मैंने शमसुन्निहार के प्रेम में क्या-क्या विपत्तियाँ उठाईं और इस अंत समय में भी उसी की याद कर रहा हूँ। मुझे मरने का दुख नहीं है। अब तुमसे अंतिम प्रार्थना है कि मैं मर जाऊँ तो मेरे शव को कुछ दिनों के लिए इसी भले आदमी की निगरानी में छोड़ना और बगदाद जा कर मेरी माता को मेरी मृत्यु की सूचना देना और कहना कि यहाँ से मेरी लाश उठवा कर ले जाएँ और विधिपूर्वक दफन करवाएँ।

यह कह कर शहजादे ने अपने प्राण छोड़ दिए। जौहरी उसके लिए बहुत देर तक विलाप करता रहा। उस दिन उस भले आदमी के पास लाश रखवा कर एक यात्री दल के साथ बगदाद की ओर चला। बगदाद पहुँच कर उसने शहजादे की मृत्यु की सूचना उसकी माँ को दी। बेचारी वृद्धा जवान बेटे के लिए सिर पीट-पीट कर बहुत रोई। फिर कई सेवकों के साथ वहाँ गई जहाँ शहजादे का शव रखा हुआ था।

इधर जौहरी अपने घर में बैठा शोक मना रहा था कि उसके पूरे प्रयत्नों के बाद भी इस प्रेम-प्रसंग का ऐसा दुखद अंत हुआ। एक दिन वह इसी शोक में अपने घर के सामने घूम रहा था कि उसे शमसुन्निहार की वही विश्वस्त दासी मिली। वह उसे अपने घर में ले गया और उसे बताया कि उसकी सूचना के बाद जब शहजादे के साथ मैं भागा तो क्या हुआ और किस प्रकार उस शहजादे ने शमसुन्निहार की याद करते हुए प्राण छोड़ दिए। और अब शहजादे की माँ अपने बेटे की लाश लेने गई है।

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