अबुल हसन और हारूँ रशीद की प्रेयसी शमसुन्निहर की कहानी – अलिफ लैला (Abul Hasan Haru Rashid Shamsunnihar Story Hindi – Alif Laila)

जब यह दोनों शहजादे के घर पहुँचे तो इतने थके थे कि एक कदम चलना भी मुश्किल था किंतु शहजादे के नौकरों ने दोनों को सहारा दे कर अंदर पहुँचाया और आराम से बिठाया। जौहरी कुछ ताजादम हुआ तो शहजादे ने अपने नौकरों को आज्ञा दी कि जौहरी को माल-असबाब के साथ आराम से उसके घर पर पहुँचा दिया जाए। जौहरी जब अपने घर आया तो देखा कि घरवाले उसकी चिंता में रो-पीट रहे हैं। जौहरी को सही-सलामत देख कर उन लोगों को ढाँढ़स बँधा और सब उससे पूछने लगे कि तुम कहाँ गए थे और क्या हुआ था। उसने यह कह कर कि मैं बहुत थका हूँ सभी को चुप कर दिया और चुपचाप अपने बिस्तर पर लेट गया।

दो दिन में जौहरी अपनी थकान और मानसिक आघात से उबर सका। तीसरे दिन वह अपने एक मित्र के घर जी बहलाने जा रहा था कि मार्ग में एक स्त्री ने उसे अपने पास आने का इशारा किया। जौहरी पास गया तो उसने पहचाना कि यह शमसुन्निहार की विश्वस्त दासी है। जौहरी इतना डरा हुआ था कि उसने उससे वहाँ पर कोई बात न की और उसे अपने पीछे आने का इशारा कर के एक ओर को चलने लगा। दासी भी पीछे-पीछे चली। वे लोग चलते-चलते एक निर्जन मस्जिद में गए और वहाँ दासी ने जौहरी से पूछा कि आप डाकुओं से कैसे बचे। जौहरी ने कहा, पहले तुम अपना हाल बताओ कि तुम और दो अन्य दासियाँ कैसी बचीं। दासी ने कहा कि जब डाकू आपके घर पर आए तो हम तीनों ने समझा कि खलीफा को पता चल गया है और उसने अपने सिपाही भेजे हैं। हम तीनों अपनी जान के डर से मकान की छत पर चढ़ गईं और छतों-छतों होते हुए एक भले मानस के घर में आ गईं। उसने दया कर के हमें रात भर अपने यहाँ सुरक्षित रखा। सवेरे हम लोग अपने आवास पर पहुँचे। अन्य दासियाँ स्वामिनी को हमारे साथ न देख कर चिंतित हुई तो हमने उन्हें दिलासा दिया कि वे अपनी एक सहेली के घर रह गई हैं।

दासी ने कहा, हम लोग भी स्वामिनी के बारे में चिंतित थे। हमने उस शाम को एक नाव पर एक आदमी को भेजा कि अगर किसी सुंदरी को किसी आदमी के साथ भटकते देखें तो यहाँ ले आएँ।

हम लोग आधी रात तक हर आहट पर कान लगाए रहे। आधी रात को अपने आवास के पिछवाड़े के घाट पर नाव का शब्द सुना। जा कर देखा कि हमारे भेजे हुए आदमी तथा एक अन्य व्यक्ति के साथ स्वामिनी नाव पर आई हैं। वे इतनी अशक्त थीं कि एक कदम चल भी नहीं सकती थीं। हम लोग उन्हें सँभाल कर लाए। उन्होंने चुपके से उन दो आदमियों को एक हजार अशर्फी दे कर विदा किया। अब वे अच्छी हैं। उन्होंने हम लोगों को डाकुओं द्वारा पकड़े जाने और छूटने का वृत्तांत भी बताया। दासी के यह कहने के बाद जौहरी ने भी वह सब कुछ बताया जो उस पर और शहजादे पर बीता था।

दासी ने दो थैलियाँ अशर्फियों की दीं और कहा, हमारी स्वामिनी ने यह आपके लिए भेजी हैं क्योंकि उन्हें इस बात का बड़ा ख्याल है कि आपको उनकी वजह से बड़ा कष्ट और नुकसान हुआ है इसलिए आपकी क्षतिपूर्ति की जा रही है। जौहरी ने धन्यवादपूर्वक वह धन ले लिया। उसने उसमें से कुछ इसलिए खर्च किया कि मित्रों से माँगी हुई वस्तुएँ उन्हें खरीद कर लौटा दे। फिर भी काफी बचा जिससे उसने एक विशाल और सुंदर मकान उसी दिन बनवाना आरंभ कर दिया।

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