अबुल हसन और हारूँ रशीद की प्रेयसी शमसुन्निहर की कहानी – अलिफ लैला (Abul Hasan Haru Rashid Shamsunnihar Story Hindi – Alif Laila)

वह इसी तरह चिंता में पड़ा था कि दोपहर को एक सेवक ने उससे कहा कि एक आदमी आप से मिलना चाहता है। उस आदमी ने अंदर जा कर जौहरी से कहा कि यहाँ नहीं, अपने किराएवाले बड़े मकान में चलो, वहीं तुमसे बात करूँगा। जौहरी को आश्चर्य हुआ कि इस अजनबी को यह कैसे मालूम है कि मैंने कोई मकान किराए पर लिया था। आदमी उसे घुमावदार गलियों से हो कर ले चला और बोला कि इन्हीं गलियों से हो कर डकैत कल तुम्हारे घर आए थे। जौहरी को यह तो आश्चर्य हो ही रहा था कि इसे सब बातें मालूम कैसे हैं, इस बात पर भी आश्चर्य और भय हो रहा था कि वह उसे उसके दूसरे मकान में भी नहीं ले जा रहा था बल्कि कहीं और ही ले जा रहा था।

चलते-चलते शाम हो गई। जौहरी बहुत थक भी गया था और उसका भय भी बहुत बढ़ गया था किंतु उसकी कुछ कहने की हिम्मत नहीं पड़ रही थी। शाम को वे लोग दजला नदी पर पहुँचे और नाव से नदी पार कर के नदी पारवाले क्षेत्र में भी गलियों में चलते-चलते एक मकान के सामने पहुँचे जहाँ खड़े हो कर उस आदमी ने ताली बजाई।

दरवाजा खुलने पर वह आदमी जौहरी को अंदर ले गया। अंदर दस व्यक्ति बैठे थे जिन्होंने जौहरी का स्वागत किया और आदरपूर्वक अपने पास बिठाया। कुछ देर में उनका सरदार आया जिसके बाद सबने भोजन किया। भोजन के बाद उन लोगों ने जौहरी से पूछा कि क्या तुमने कभी पहले भी हमें देखा है। उसने कहा कि न तो मैंने पहले तुम लोगों ही को देखा न नदी पार के इस हिस्से की गलियाँ ही देखीं। फिर उन लोगों ने कहा कि कल रात जो कुछ तुम्हारे साथ हुआ वह साफ-साफ बताओ। जौहरी ने आश्चर्य से कहा कि तुम लोगों को यह कैसे मालूम कि कल रात मेरे साथ कोई विशेष घटना घटी थी। उन लोगों ने कहा कि हमें यह उस पुरुष और स्त्री से मालूम हुआ जो कल रात तुम्हारे साथ थे लेकिन हम चाहते हैं कि तुम्हारे मुँह से पूरा विवरण सुनें। जौहरी सोचने लगा कि कहीं यही तो वे डाकू नहीं है जो रात को आए थे।

उसने कहा, भाइयो, जो कुछ होना था वह हो गया किंतु मुझे असली चिंता उसी आदमी और उसी सुंदरी की है। तुम लोगों को उनका कुछ हाल मालूम हो तो बताओ। उन लोगों ने कहा कि तुम उन दोनों की चिंता छोड़ दो, वे दोनों कुशलतापूर्वक हैं। उन्होंने जौहरी को दो कक्ष दिखाए और कहा, वे दोनों अलग-अलग इन्हीं कमरो में हैं। उन्हीं से हमें तुम्हारा पता चला है और उन्होंने बताया है कि तुम उनके सहायक और मित्र हो। हम लोगों का काम किसी पर दया करना नहीं है, फिर भी हमने अपने स्वभाव के विपरीत उन दोनों को बड़ी सुख-सुविधा के साथ रखा और उन्हें किसी प्रकार का कष्ट नहीं होने दिया। और हम तुम्हें भी कोई कष्ट नहीं होने देंगे।

अब जौहरी को विश्वास हो गया कि वे डाकू हैं। उसने उनकी दया के लिए आभार प्रकट किया और शहजादे तथा शमसुन्निहार की प्रेम-कथा आरंभ से पिछली रात तक विस्तारपूर्वक बताई। उन लोगों ने आश्चर्य से कहा, क्या यह सच है कि यह आदमी फारस के शहजादे बका का पुत्र अबुल हसन है और यह स्त्री खलीफा की प्रेयसी शमसुन्निहार है? जौहरी ने कहा कि मैंने जो कुछ कहा है बिल्कुल सच कहा है। जब डाकुओं को जौहरी के कहने का विश्वास हुआ तो उन्होंने एक-एक कर के अबुल हसन और शमसुन्निहार के पास जा कर अपने अपराध के लिए क्षमा-प्रार्थना की। उन्होंने कहा कि हम लोग आपको जानते नहीं थे इसीलिए हम से यह अपराध हुआ है।

उन्होंने कहा कि हमने जो कुछ आपके घर से लूटा था वह सब का सब तो वापस नहीं कर सकते क्योंकि उसमें से बहुत कुछ हमारे अन्य साथी ले गए हैं किंतु सोने और चाँदी के बरतन जरूर यहाँ है, उन्हें हम वापस कर देंगे। उन डाकुओं ने बरतन दे कर उन तीनों से कहा कि हम तुम्हें सुरक्षापूर्वक नदी के उस पार पहुँचा देंगे। किंतु तुम लोगों को यह वादा करना पड़ेगा कि हमारा भेद नहीं खोलोगे। उन तीनों ने कसम खाई कि हम लोग तुम्हारे बारे में किसी को नहीं बताएँगे।

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