अबुल हसन और हारूँ रशीद की प्रेयसी शमसुन्निहर की कहानी – अलिफ लैला (Abul Hasan Haru Rashid Shamsunnihar Story Hindi – Alif Laila)

शहजादा यह सुन कर बड़ा खुश हुआ। उसने जौहरी का बड़ा आभार प्रकट किया और कहा कि तुम जैसा कहोगे वैसा ही करूँगा। जौहरी उससे विदा हो कर अपने घर आया। दूसरे दिन दासी फिर आई। जौहरी ने कहा, बहुत अच्छा हुआ कि तुम आई, मैं तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रहा था। दासी ने कारण पूछा तो जौहरी ने कहा कि शहजादे का विरह में बुरा हाल है, तुम जैसे भी हो शमसुन्निहार को लाओ ताकि दोनों का मिलन हो सके।

दासी ने कहा, स्वामिनी का भी शहजादे के विरह में यह हाल है जैसे कोई मछली गर्म बालू पर तड़प रही हो। किंतु आपका घर बहुत छोटा है, उन दोनों के मिलन के योग्य नहीं है। जौहरी ने कहा कि मैंने एक बड़ा मकान ठीक किया है, तुम मेरे साथ चल कर उसे देख लो। दासी ने उसके साथ वह मकान देखा और पसंद किया और बोली कि मैं अभी आती हूँ, अगर स्वामिनी आने को राजी होती हैं तो मैं उन्हें ले कर तुरंत आ जाऊँगी। दासी विदा हो कर कुछ ही देर में फिर जौहरी के पास आ गई और जौहरी को अशर्फियों की एक थैली दे कर बोली, यह स्वामिनी ने इसलिए भिजवाई है कि आप उस बड़े मकान में आवश्यक साज-सज्जा करा लें और नाश्ते, पलंग, मसनद आदि वहाँ पर तैयार रखें। यह कह कर दासी चली गई और इधर जौहरी ने अपने व्यापारी मित्रों के यहाँ से कई सोने-चाँदी के बरतनों और गद्दे, तकिया, मसनद, पर्दे आदि मँगवा कर उक्त मकान को सजा दिया।

सारा प्रबंध करने के बाद वह शहजादे के पास गया और उससे अपने साथ चलने को कहा। शहजादा उत्तम और सजीले कपड़े पहन कर जौहरी के साथ चला। जौहरी उसे सुनसान गलियों से हो कर बड़े मकान में ले आया। शहजादा मकान और साज-सज्जा को देख कर प्रसन्न हुआ और जौहरी से इधर-उधर की बातें करता रहा। दिन ढला और शमसुन्निहार अपनी उसी विशिष्ट दासी तथा अन्य दासियों को ले कर वहाँ गई। शहजादा और शमसुन्निहार दोनों एक-दूसरे को देख कर ऐसे प्रसन्न हुए जिसका वर्णन शब्दों में नहीं हो सकता। बहुत देर तक तो वे बगैर बोले-चाले एक दूसरे को एकटक देखते ही रहे।

फिर दोनों ने अपनी-अपनी विरह व्यथा का इतने कारुणिक रूप से वर्णन किया कि जौहरी की आँखों में आँसू आ गए और शमसुन्निहार की तीनों दासियाँ रोने लगीं। जौहरी ने उन दोनों को तसल्ली दी और धैर्य से काम लेने के लिए समझाया-बुझाया। फिर दोनों को उस जगह लाया जहाँ जलपान की व्यवस्था थी। जलपान के उपरांत वे लोग वहाँ पर आ कर मसनदों पर बैठे जहाँ से उठ कर नाश्ता करने गए थे। वे एक-दूसरे से प्रीतिपूर्वक वार्तालाप करने लगे। शमसुन्निहार ने पूछा कि यहाँ कोई बाँसुरी तो नहीं होगी। जौहरी ने सारा प्रबंध पहले ही कर रखा था। उसने एक बाँसुरी ला कर दे दी। शमसुन्निहार ने बाँसुरी पर बड़ी देर तक प्रेम और विरह को व्यक्त करनेवाली एक धुन बजाई। इसके बाद शहजादे ने भी उसके जवाब में उसी बाँसुरी पर बड़ी कारुणिक ध्वनि में एक विरह-राग निकाला।

इतने ही में मकान के बाहर बड़ा शोरगुल सुनाई दिया। दो क्षण बाद जौहरी का एक नौकर दौड़ा-दौड़ा आया और बोला कि द्वार पर बहुत-से आदमी जमा हैं और वे द्वार तोड़ कर अंदर आना चाहते हैं। उसने कहा कि जब मैंने उनसे पूछा कि तुम कौन हो और क्या चाहते हो तो उन्होंने मुझे पीटना शुरू कर दिया और मैं जान बचा कर द्वार बंद कर के अंदर भाग गया। यह सुन कर जौहरी स्वयं द्वार पर गया कि देखे कि क्या बात है। द्वार खोला तो देखा कि सौ आदमी हाथों में नंगी तलवारें लिए खड़े हैं। उसकी हिम्मत न उनसे बात करने की हुई न अंदर वापस आने की। वह एक पड़ोसी की, जिसे वह पहले से जानता था, दीवार पर चढ़ कर उसके मकान में कूद पड़ा। उसने पड़ोसी को बताया कि मुझ पर क्या बीत रही है। पड़ोसी ने उसे घर के एक कोने में छुपा लिया।

आधी रात को पड़ोसी की तलवार ले कर जौहरी बाहर निकला क्योंकि उस समय सारा शोर थम गया था और निस्तब्धता छा गई थी। बड़े मकान में देखा तो उसे सुनसान पाया। न वहाँ शहजादा या शमसुन्निहार या उनकी दासियाँ थीं न कोई साज सामान या बरतन-भाँडे। मकान में घूमते-घूमते एक कोने में उसे एक आदमी का शब्द सुनाई दिया। उसने पूछा, कौन हो? छुपे हुए आदमी ने उसकी आवाज पहचानी और बाहर निकल आया। वह जौहरी का एक सेवक था।

जौहरी ने उससे पूछा कि वे हथियारबंद लोग क्या गश्त के सिपाही थे। उसने कहा वे लोग गश्त के सिपाही नहीं थे बल्कि डाकू थे और सब कुछ लूट कर ले गए, कई दिनों से यह लोग लूट-मार कर रहे हैं और कई मुहल्लों में जा कर कई घरों में डाका डाल चुके हैं।

जौहरी को भी विश्वास हो गया कि वे लोग डाकू ही थे क्योंकि वे सारी चीजें भी लूट कर ले गए थे। उसने शहजादा और शमसुन्निहार के साथ सारा साज-सामान भी गायब देखा तो सिर पीटने लगा कि जिन मित्रों से वह चीजें माँग कर लाया था उन्हें क्या जवाब दूँगा। सेवक ने उसे धैर्य देते हुए कहा, विश्वास रखिए कि शहजादा और शमसुन्निहार दोनों कुशलपूर्वक होंगे। जहाँ तक माँगे की चीजों की बात है उसके बारे में भी आपके मित्र कुछ न कहेंगे क्योंकि इस डाके का समाचार तो सब को मालूम ही हो जाएगा। जौहरी सोचने लगा कि इब्न ताहिर ही अच्छा रहा कि समय रहते निकल गया। मेरा माल तो लूटा ही है, देखो आगे क्या होता है, जान भी बचती है या नहीं।

सवेरा होने पर सारे शहर में डाके का समाचार फैल गया। जौहरी के मित्र भी उसके घर पर सहानुभूति प्रकट करने आए क्योंकि उन्हें मालूम था कि वह मकान उसने किराए पर लिया था। जिन मित्रों से चीजें माँग कर लाया था उन्होंने तो कह दिया कि सामान की चिंता न करो, लेकिन जौहरी को शहजादा और शमसुन्निहार की चिंता होने लगी कि न जाने उन पर क्या बीत रही हो। मित्रों के विदा होने के बाद जौहरी के सेवक उसके लिए भोजन लाए किंतु उसे शमसुन्निहार और शहजादे की चिंता इतनी सता रही थी कि उसने नाममात्र को भोजन किया।

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