अबुल हसन और हारूँ रशीद की प्रेयसी शमसुन्निहर की कहानी – अलिफ लैला (Abul Hasan Haru Rashid Shamsunnihar Story Hindi – Alif Laila)

जौहरी चिंतित हो कर बोला, शमसुन्निहार मुझे भी व्यापारी इब्न ताहिर जैसा समझे है। इब्न ताहिर को तो राजमहल में सब जानते थे और द्वारपाल उसे बे रोक-टोक आने देते थे। मुझे कौन आने देगा?

दासी ने कहा, जो कुछ आप कहते हैं वह बिल्कुल ठीक है। लेकिन शमसुन्निहार मूर्ख नहीं है। उसने आप को बुलाया है तो आगा-पीछा सोच ही लिया होगा। आप बेधड़क हो कर मेरे साथ चलिए, आपको कोई परेशानी न होगी। आपको कुशलतापूर्वक आपके घर पहुँचाने की जिम्मेदारी मेरी रही। इस प्रकार दासी ने उसे बहुत दिलासा दिया किंतु वह किसी प्रकार भी राजमहल में जाने के लिए तैयार नहीं हुआ।

फिर वह दासी शमसुन्निहार के पास पहुँची और उससे कहा कि जौहरी यहाँ आने से डरता है और मेरे लाख समझाने पर भी आने को राजी नहीं होता। शमसुन्निहार ने थोड़ी देर सोच कर कहा, उसका डरना ठीक ही है। मैं स्वयं ही गुप्त रूप से यहाँ से निकल कर उससे उसके घर में मिलूँगी। तुम जा कर उसे बता दो कि मैं उसके घर आ कर उससे बात करना चाहती हूँ। दासी ने ऐसा ही किया। जौहरी के घर जा कर उसने कहा, आप कहीं बाहर न जाएँ। कुछ ही देर में मैं मालकिन को ले कर आपके यहाँ आती हूँ।

यह कह कर दासी वापस फिरी और कुछ देर में शमसुन्निहार को ले कर जौहरी के घर पहुँची। जौहरी ने बड़े आदरपूर्वक शमसुन्निहार का स्वागत कर के उसे उच्च स्थान पर बिठाया। जब शमसुन्निहार ने अपने चेहरे से नकाब उतारा तो जौहरी उसे देखता ही रह गया। उसने सोचा कि अगर शहजादा इस स्वर्गोपम सौंदर्य के पीछे पागल है तो क्या आश्चर्य है। फिर शमसुन्निहार उससे बातें करने लगी। अपने प्रेम का पूरा वर्णन करने के बाद उसने कहा, मुझे तुझसे मिल कर बहुत प्रसन्नता हुई है। भगवान की बड़ी कृपा है कि इब्न ताहिर के चले जाने के बाद उसने हम दो प्रेमियों को तुम्हारे जैसा सहायक दिया है। अब मैं विदा होती हूँ, भगवान तुम्हारी रक्षा करें।

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