अबुल हसन और हारूँ रशीद की प्रेयसी शमसुन्निहर की कहानी – अलिफ लैला (Abul Hasan Haru Rashid Shamsunnihar Story Hindi – Alif Laila)

जौहरी ने कहा, मैंने व्यापारी को शहर छोड़ने की सलाह नहीं दी। हाँ, यह जरूर है कि जब उसने मुझ से कहा कि मैं बसरा में बसना चाहता हूँ तो मैंने उसे रोका नहीं। मैंने सोचा कि इस व्यक्ति को अपनी प्रतिष्ठा और अपनी जान बचाने की चिंता है तो उसे क्यों रोका जाए। शहजादे ने कहा, तुम्हारी बात मेरी समझ में आती है और मुझे तुम पर पूरा विश्वास है किंतु शमसुन्निहार की दासी ने अपनी स्वामिनी से भी यही बात कही होगी जो मुझसे कही है। अब यह जरूरी हो गया है कि जैसे तुमने मुझे अपनी सदाशयता का विश्वास दिलाया है वैसे ही अपने प्रति दासी में भी विश्वास पैदा करो ताकि शमसुन्निहार भी तुम्हें विश्वस्त समझे।

इस प्रकार दोनों बहुत देर तक बातें करते रहे और परामर्श करते रहे कि दोनों प्रेमीजनों के मिलन की क्या सूरत निकल सकती है। फिर वह जौहरी शहजादे से विदा ले कर अपने घर गया। शहजादे ने दासी को विदा करते समय कहा था कि अब की बार आना तो शमसुन्निहार से मेरे लिए पत्र लिखवा कर लाना। दासी ने महल में जा कर व्यापारी को शहर छोड़ जाने और शहजादे की पत्र पाने की इच्छा की बातें शमसुन्निहार को बताईं। शमसुन्निहार ने एक लंबा पत्र लिखा जिसमें अपनी विरह-दशा का कारुणिक वर्णन था और इस बात पर भी दुख प्रकट किया गया था कि हम लोगों का मध्यस्थ व्यापारी शहर छोड़ कर चला गया है।

दासी पत्र ले कर शहजादे के पास आने लगी तो रास्ते में उसके हाथ से पत्र गिर गया। दस-बीस कदम आगे जा कर उसने अपनी जेब में पत्र न देखा तो उलटे पाँव लौटी। मार्ग में उसने जौहरी को वह पत्र पढ़ते हुए पाया। इससे दोनों में कहा-सुनी हुई। दासी ने कहा, यह मेरा पत्र है, मुझे वापस दो। जौहरी ने उसकी बात पर ध्यान न दिया और पत्र पढ़ता रहा और फिर अपने घर को चल पड़ा। दासी भी पत्र वापस करने का तकाजा करती हुई उसके पीछे-पीछे चली। जौहरी के घर पहुँच कर उसने कहा, तुम मुझे यह पत्र दे दो। यह तुम्हारे किसी काम का नहीं है। तुम्हें तो यह भी नहीं मालूम है कि यह पत्र किसने किसके नाम लिखा है। जौहरी ने उसे एक जगह दिखा कर बैठने का इशारा किया।

दासी बैठ गई तो जौहरी ने कहा, यद्यपि इस पत्र पर न लिखनेवाले का नाम है न पानेवाले का नाम तथापि मुझे मालूम है कि यह पत्र शमसुन्निहार ने शहजादा अबुल हसन को लिखा है। दासी यह सुन कर घबरा गई। जौहरी ने कहा, मैं तुम्हें रास्ते ही में यह पत्र दे देता किंतु मुझे तुम से कुछ पूछना है, इसीलिए मैं तुम्हें यहाँ ले आया। तुम सच-सच बताओ कि क्या तुमने शहजादे से यह नहीं कहा कि इस जौहरी ने व्यापारी को बगदाद छोड़ने की राय दी है। दासी ने स्वीकार किया कि उसने यही कहा है। जौहरी बोला, तू मूर्ख है। मैं तो चाहता हूँ कि अब व्यापारी के बदले मैं ही शहजादे की सहायता करूँ। तू उलटा ही समझे है। निःसंदेह मैंने ही शहजादे को व्यापारी के शहर छोड़ने का समाचार दिया था। पहले शहजादा मुझसे सशंकित था किंतु मेरे विश्वास दिलाने पर उसने सारा भेद मुझसे कह दिया। अब तू मुझे व्यापारी की जगह इस बात में पूरा विश्वासपात्र समझ और अपनी स्वामिनी से भी कहना कि जौहरी तुम्हारी और शहजादे की प्रसन्नता के लिए अपनी प्रतिष्ठा ही नहीं, अपने प्राण भी दाँव पर लगा देगा।

दासी ने कहा, शहजादा अबुल हसन और शमसुन्निहार दोनों बड़े भाग्यशाली हैं कि व्यापारी चला गया तो तुम जैसा बुद्धिमान सहायक उन्हें मिला। मैं तुम्हारी सद्भावना की पूरी बात अपनी स्वामिनी से कहूँगी। जौहरी ने पत्र उसे दे दिया और कहा कि शहजादा उसके उत्तर में जो कुछ लिखे वह भी मुझे लौटते समय दिखाती जाना और साथ ही हमारी इस समय की बातचीत भी शहजादे को बता देना।

दासी पत्र ले कर शहजादे के पास गई। उसने तुरंत ही उस का उत्तर लिख दिया। दासी ने अपने वचन के अनुसार शहजादे का पत्र भी जौहरी को दिखाया। वह शमसुन्निहार के पास पहुँची और शहजादे का पत्र उसे दे कर जौहरी की भी बड़ी प्रशंसा करने लगी। दूसरे दिन सुबह वह फिर जौहरी के पास आई और बोली, मैंने अपनी स्वामिनी से वह सब कहा जो आप ने मुझ से कहा था। वह यह सुन कर अति प्रसन्न हुईं कि व्यापारी चला गया फिर भी आप उसका स्थान ले कर प्रेमियों के बीच मध्यस्थता के लिए प्रस्तुत हैं। मैंने आपकी शहजादे से हुई बातें भी उन्हें बताईं और कहा कि आप उससे भी बढ़ कर हैं। वह और भी खुश हुई और कहने लगी कि मैं चाहती हूँ कि ऐसे भले मानस से भेंट करूँ जो बगैर कहे और बगैर पूर्व परिचय के खतरा उठा कर भी दूसरों की सहायता करने को राजी हो जाता है। मैं स्वयं उसकी बुद्धि और चतुरता देखना चाहती हूँ और तू उसे कल यहाँ ले आ।

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