अबुल हसन और हारूँ रशीद की प्रेयसी शमसुन्निहर की कहानी – अलिफ लैला (Abul Hasan Haru Rashid Shamsunnihar Story Hindi – Alif Laila)

शहजादा जौहरी की बात सुन कर पीला पड़ गया और बोला, क्या तुम्हारी यह बात ठीक है कि व्यापारी बगदाद छोड़ गया? जौहरी ने कहा कि मेरा तो यही विचार है। शहजादे ने अपने एक नौकर से कहा कि व्यापारी के घर जा कर पता लगाए कि वह कहाँ है। सेवक ने कुछ देर बार आ कर कहा कि व्यापारी के घरवाले कहते हैं कि वह दो दिन हुए बसरा चला गया है और वहीं रहेगा। नौकर ने चुपके से यह भी बताया कि किसी अमीर महिला की दासी आप से मिलने आई है। शहजादा समझ गया कि शमसुन्निहार की ही दासी होगी। उसने उसे बुलाया। जौहरी उसके आने के पहले उठ कर दूसरे कक्ष में जा बैठा। दासी ने आ कर शहजादे की दशा अधिक अच्छी देखी और उससे कुछ बातें कर के विदा हुई।

अब जौहरी फिर आ कर शहजादे के पास बैठा और कहने लगा कि आपका तो खलीफा के महल से बड़ा संपर्क जान पड़ता है। शहजादे ने चिढ़ कर कहा, तुम यह कैसे कहते हो? क्या तुम्हें मालूम है कि यह स्त्री कौन है। जौहरी ने कहा, मैं इसको और इसकी स्वामिनी को अच्छी तरह जानता हूँ। यह खलीफा की चहेती सेविका शमसुन्निहार की दासी है और अपनी मालकिन के साथ आया करती है जो कि मेरे दुकान से जवाहारात खरीदने आती-रहती है। मैंने इसे कई बार उस व्यापारी के पास भी आते-जाते देखा है।

शहजादा यह सुन कर डर गया कि यह आदमी हमारे सारे भेद जानता है। वह एक क्षण चुप रह कर बोला, मुझ से सच-सच कहो कि क्या तुम इस दासी के यहाँ आने का भेद जानते हो। जौहरी ने व्यापारी से हुई सारी बातें शहजादी को बताईं और कहा, मैं आपके पास इसी कारण से उपस्थित हुआ हूँ। व्यापारी के चले जाने के बाद मुझे आप पर बड़ी दया आई कि आपका मध्यस्थ कौन होगा। मैंने तय किया कि व्यापारी की जगह मैं ही आपका विश्वासपात्र सेवक बन कर कार्य करूँ। मुझसे अधिक विश्वसनीय व्यक्ति आपको और कोई नहीं मिलेगा।

शहजादे को उसकी बातें सुन कर धैर्य हुआ। उसने अपने मन का भेद जौहरी को बताया किंतु साथ ही कहा, भाई, मुझे तो तुम पर पूरा विश्वास है किंतु शमसुन्निहार की दासी ने तुम्हें यहाँ बैठे देख लिया है। वह तुमसे खुश नहीं मालूम होती। वह कह रही थी कि तुम्हीं ने व्यापारी को यह नगर छोड़ कर बसरा जा बसने की सलाह दी है। दासी ने यह बात अपनी स्वामिनी से भी कही होगी। ऐसी दशा में तुम मध्यस्थ किस तरह बन सकते हो।

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