अबुल हसन और हारूँ रशीद की प्रेयसी शमसुन्निहर की कहानी – अलिफ लैला (Abul Hasan Haru Rashid Shamsunnihar Story Hindi – Alif Laila)

शहजादे से विदा हो कर दासी और व्यापारी अपने-अपने घर गए। व्यापारी चिंता में पड़ गया कि यह दासी रोज-रोज मेरे पास आती है और मुझे रोज-रोज उसे ले कर शहजादे के पास जाना पड़ता है। शहजादा और शमसुन्निहार तो एक-दूसरे के प्रेम में पागल हैं किंतु अगर खलीफा को पता चलेगा तो मैं मुफ्त में मारा जाऊँगा, मेरी सारी प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल जाएगी और क्या जाने जान पर भी बन आए और मेरे परिवार पर भी मुसीबत पड़े। इससे अच्छा है कि मैं यह नगर ही छोड़ दूँ और कहीं और जा बसूँ। एक दिन व्यापारी इसी चिंता में अपनी दुकान पर बैठा था कि उसका एक मित्र जो जौहरी था उससे मिलने को आया। वह बराबर व्यापारी के पास शमसुन्निहार की दासी को आते और फिर दोनों को शहजादे के पास आते देख रहा था। व्यापारी को चिंतित देख कर वह समझा कि इस पर कोई बड़ी विपत्ति पड़ी है। अतएव उसने पूछा कि खलीफा के महल की दासी तुम्हारे पास क्यों आया करती है।

व्यापारी को इस प्रश्न से भय हुआ। उसने कहा कि यूँ ही कुछ लेन-देन के काम से आती है। जौहरी ने कहा, लेन-देन नहीं, कोई और बात है। व्यापारी ने जब देखा कि जौहरी को उसके उत्तर से संतोष नहीं हुआ तो उसने तय किया कि उसे पूरा हाल बता ही देना ठीक है। उसने भेद गुप्त रखने का वचन ले कर उससे कहा, शमसुन्निहार और फारस का शहजादा एक-दूसरे से प्रेम करते हैं और मेरी मध्यस्थता से एक-दूसरे का हाल पाते हैं, मैं सोचता हूँ कि कहीं यह बात खलीफा को ज्ञात हो गई तो भगवान जाने मेरा क्या हाल होगा। इसलिए अब मैं सोचता हूँ कि यहाँ का कारोबार समेट कर बसरा चला जाऊँ और वहीं बस जाऊँ।

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