अबुल हसन और हारूँ रशीद की प्रेयसी शमसुन्निहर की कहानी – अलिफ लैला (Abul Hasan Haru Rashid Shamsunnihar Story Hindi – Alif Laila)

शहजादे ने हकीमों और रिश्तेदारों से कहा, मैं इनसे अकेले में बात करना चाहता हूँ। उनके जाने पर उसने व्यापारी से कहा, मित्र, तुम देख रहे हो कि इस अनिंद्य सुंदरी का वियोग मुझे किस तरह घुला-घुला कर मारे डालता है। सारे कुटुंबीजन और मित्रगण मेरी यह अवस्था देख कर बराबर दुखी रहते हैं। उन लोगों को दुखी देख कर मेरा दुख और बढ़ता है। मुझे अपना हाल उनसे कहने में लज्जा भी आती है इसलिए मैं जी ही जी में घुटता जा रहा हूँ। तुम्हारे आने से मुझे बड़ा धैर्य हुआ। अब तुम बताओ कि शमसुन्निहार का क्या समाचार लाए हो। उस दासी ने तुम से कब बात की ओर अपनी स्वामिनी का क्या हाल बताया।

व्यापारी ने बताया कि दासी अभी तक नहीं आई है। शहजादा यह सुन कर आँसू बहाने लगा। व्यापारी ने कहा कि तुम्हें चाहिए कि अपने को सँभालो, रोने से कुछ भला तो होना नहीं है। शहजादा बोला कि मैं क्या करूँ, मैं लाख अपने को सँभालता हूँ किंतु सँभाल नहीं पाता। व्यापारी ने कहा, तुम बेकार की चिंता न करो। दासी आज नहीं तो कल आएगी ही और शमसुन्निहार की कुशलता का समाचार देगी। इस प्रकार उसे बहुत कुछ धैर्य बँधा कर व्यापारी अपने घर आया। घर आ कर देखा कि शमसुन्निहार की दासी उसकी प्रतीक्षा कर रही है। उसने व्यापारी से कहा कि अपना हाल बताओ कि तुम पर और शहजादे पर महल से निकल कर क्या बीती क्योंकि विदा के समय शहजादे की हालत अच्छी नहीं थी। व्यापारी ने मार्ग के कष्ट और शहजादे की लंबी खिंचती बीमारी का उल्लेख किया।

दासी ने कहा, स्वामिनी का भी वही हाल है जो शहजादे का है। तुम्हें विदा कर के जब मैं उनके महल में गई तो देखा कि बेहोश है। खलीफा को भी आश्चर्य था कि वह बेहोश क्यों हो गई।

उसने हम लोगों से इस बेहोशी का कारण पूछा तो हम असली भेद को छुपा गए। हमने कहा, हमें कुछ नहीं मालूम। हम लोग केवल रोते-धोते रहे। कुछ देर में स्वामिनी की आँखें खुलीं।

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