अबुल हसन और हारूँ रशीद की प्रेयसी शमसुन्निहर की कहानी – अलिफ लैला (Abul Hasan Haru Rashid Shamsunnihar Story Hindi – Alif Laila)

अब व्यापारी ने शहजादे से कहा कि हम लोगों का यहाँ रहना खतरनाक है, हमें तुरंत यहाँ से चल देना चाहिए। इसके बाद वह दासी दोनों को गुप्त द्वार से बाहर निकाल कर उस नहर पर लाई जो बाग से हो कर जाती थी और दजला नदी से मिलती थी। वहाँ पहुँच कर उसने धीरे से आवाज लगाई। एक आदमी नाव खेता हुआ उस स्थान पर आ गया। दासी ने उन दोनों को नाव पर बिठा दिया। माँझी शीघ्रता से नाव खेता हुआ दजला नदी में ले गया। शहजादे की हालत अब भी खराब थी। व्यापारी उसे बराबर समझाता जा रहा था कि तुम अपने को सँभालो, हमें दूर जाना है, अगर इस अरसे में हमें गश्त के सिपाही मिल गए तो हमारी जान के लाले पड़ जाएँगे क्योंकि वे हमें चोर समझेंगे।

खुदा-खुदा कर के यह लोग एक सुरक्षित स्थान पर नाव से उतरे। किंतु न शहजादे की मानसिक अवस्था ही ठीक थी न उसमें चलने की शक्ति ही अधिक थी। व्यापारी इसी चिंता में था कि क्या किया जाए। अचानक उसे याद आया कि उस जगह के समीप ही उसका एक मित्र रहता है। वह शहजादे को किसी तरह खींचखाँच कर अपने मित्र के घर ले गया। मित्र उसे देखते ही दौड़ा आया। उसने दोनों को अपनी बैठक में ला कर बिठाया और पूछा कि तुम ऐसी हालत में कहाँ से आए हो। व्यापारी ने कहा, अजीब झंझट में पड़ा हूँ। एक आदमी पर मेरा काफी रुपया उधार है। मुझे मालूम हुआ कि वह शहर छोड़ कर भागा जा रहा है। मुझे उसका पीछा कर के अपना रुपया वसूल करने की चिंता हुई। यह आदमी जो मेरे साथ है उस भगोड़े को जानता है। इसकी मदद से मैंने उसका पीछा किया। किंतु मेरा यह साथी रास्ते में अचानक बीमार हो गया। वह भगोड़ा भी मेरे हाथ से निकल गया और इस बीमार साथी को भी मुझे सँभालना पड़ रहा है। अब हम लोग रात को यहाँ रहेंगे और सुबह ही यहाँ से चलेंगे।

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