मां बम्लेश्वरी का 2000 साल पुराना चमत्कारी मंदिर, जहा दर्शन मात्र से पूरी होती मनोकामना

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एक ऐसा मंदिर जो जितना पुराना है उतना हि चमत्कारी भी है, यह मंदिर जो करीबन 2000 साल पुराना बताया जाता है । यह मंदिर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के जिले राजनांदगांव के एक गाव डोगरगढ़ जो रायपुर से लगभग 74 km दूर है वहा पर बम्लेश्वरी देवी का का मंदिर है जो बहुत हि बड़ा चमत्कारी और दिव्य है। हर साल इस मंदिर में नवरात्री पर विशाल मेला लगता है जिसमे हजारों की तादात में माता के दर्शन के लिए भक्तजन आते है। यह मंदिर पहाड़ी पर बना हुआ है , जिसमे 1000 से भी ज्यादा सीढिय़ां है . कहा जाता है इस मंदिर में जो भी मनोकामना करता है माता रानी उसकी मनोकामना को पूरी करती है ।

नीचे बड़ी मां का मंदिर पहाड़ी पर छोटी मां
यहाँ पर दो मंदिर है जिसमे एक मंदिर पहाडीयों के ऊपर और एक पहाड़ी के निचे बना हुआ है । ऊपर वाला मंदिर छोटी माँ ( छोटी बमलई )का है और निचे वाला मंदिर बड़ी माँ ( बड़ी बमलई ) का है।

यहां कई किवदंतियां
– इस मंदिर की स्थापना को लेकर कोई पुख्ता प्रमाण तो नहीं है लेकिन कहा जाता है की उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के सपने में मां बम्लेश्वरी आई थी . उसके बाद राजा कामसेन जो की उस समय कामाख्या नगरी के राजा थे उन्होंने इस मंदिर की पहाड़ी पर स्थापना की थी ।

– इस मंदिर की एक और कहानी ये भी है की उज्जैन के राजा विक्रमादित्य और कामाख्या नगरी के राजा कामसेन के बीच एक भयंकर युद्ध हुआ था तब उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने अपनी रक्षा के लिए अपने कुलदेव महाकाल का आव्हान किया और वे युद्ध में आ गये थे तभी कामसेन ने भी मां बम्लेश्वरी का आव्हान किया था और माँ भी युद्ध में पहुच गयी थी ।

इस तरह दोनो दिव्य शक्तिया वहा पहुच गयी थी तब महाकाल ने माँ बम्लेश्वरी को प्रणाम किया और फिर दोनों राजाओ के बीच आपसी समझोता हुआ है इसके बाद कामसेन ने वहा मंदिर बनाया था ।

– माँ बम्लेश्वरी के इस मंदिर को लेकर एक कहानी ये भी है की लगभग 2500 साल पहले कामाख्या नगरी के राजा वीरसेन थे उनके कोई संतान नहीं थी जब शिव जी के और माता के आशीर्वाद से उन्हें पुत्र हुआ तब उन्होंने ये मंदिर बनवाया था ।

आते हैं लाखों श्रद्धालु
प्रकृति की गोद में बना यह मंदिर बहुत हि अद्भुत है कहते है की यहाँ के दर्शन मात्र से हि सभी मनोकामना पूरी होती है। मंदिर का विकास कार्य निरंतर जारी है , पहले इस मंदिर का रख रखाव खैरागढ़ रियासत के राजाओं की और से किया जाता था बाद में राजा वीरेन्द्र बहादुर सिंह द्वारा एक ट्रस्ट का गठन किया गया ताकि मंदिर का रख रखाव जनता की देख रेख में हो सके ।

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