ये 15 उपहार जो भारत ने दिये दुनिया को ,इन्हें नही जाना तो आपने कुछ नही जाना

पश्चिमी सभ्यता जैसे जैसे फ़ैल रही है वैसे वैसे ही हमारी अमूल्य भारतीय सभ्यता खत्म होती जा रही है | ऐसे में सभी सोचते है की भारत बहुत ही पिछड़ा हुआ देश है | आखिर अब यह बात एक एक को समझायी तो नही जा सकती है की भारत से बढकर इस दुनिया में कोई देश नही ,और कम से कम सभ्यता और संस्कृति में तो बिलकुल भी नही ,लेकिन फिर भी हम तो पश्चिमी सभ्यता को ही श्रेष्ट मानेंगे है ना , | आज तक जो भी भी लोग भारत को तकनीक और विज्ञान और खेल जैसी चीजो में कमजोर या पिछड़ा मानने वाले है उनके लिए आज हम लेकर आये है भारत द्वारा दुनिया को दिये गए ऐसे उपहार जो आज पूरी दुनिया काम में ले रही है ……

1.तक्षशिला:

तक्षशिला प्राचीन भारत में गांधार देश की राजधानी और प्राचीन भारत में शिक्षा का प्रमुख केन्द्र हुआ करता था। यह विश्व का प्रथम विश्वविद्यालय था जिसकी स्थापना आज से लगभग 700 वर्ष ईसा पूर्व में की गई थी। प्राचीन भारत में तक्षशिला नगरी विद्या और शिक्षा के महान केंद्र के रूप में सुप्रसिद्ध थी। यहां पर 300 लेक्‍चर हाल, लाइब्रेरी,प्रयोगशाला, और शोध के लिए सारी व्‍यवस्‍थाएं की गईं। एक चीनी यात्री हाईन टसांग ने अपनी डायरी में लिखा है कि जब वह यहां आया तब 10,000 स्‍टूडेंट और 200 प्रोफेसर यहां थे।

2.चेस:

चेस का खेल भी भारत ने ही पूरी दुनिया को बताया है। यह खेल भारत का अद्भुत आविष्कार है। प्राचीन भारत में यह ‘चतुरंग’ नाम से जाना जाता था। यह भारत से अरब ओर वहां से यूरोप गया था।

3.जीरो:

आज पूरी दुनिया में जीरो यानि शून्य मशहूर है। बिना शून्य के आज सब कुछ असंभव है। ऐसे यह संख्‍या भारत की ही देन है। जीरो भारत ने ही इस दुनिया को दिया है।

4.बटन:

आपके शर्ट के बटन का आविष्कार भी सर्वप्रथम भारत में ही हुआ था । इसका सबसे पहला प्रमाण मोहन जोदड़ो की खुदाई में प्राप्त हुआ। जिसमें साफ हुआ कि सिन्धु नदी के पास आज से 2500 से 3000 वर्ष पहले के बटन अस्तित्व में थे |

5.शैम्‍पू:

शैम्पू शब्द का अविष्‍कारक भारत ही है। यह शब्‍द मूलतः हिंदी शब्द चांपो से ही बनाया गया है। जिसका तात्पर्य है सिर की मालिश करना होता है। 1762 के करीब यह शब्‍द शैंपू में बदल गया है। उस समय जब मुगल शासक खुशबूदार चीजों से सिर की मसाज कराते थे।

6.गणित:

ज्यामिति, अंकगणित, बीजगणित, कैलकुलस आदि का शुभारंभ भी भारत से ही हुआ। शोधकर्ताओं द्वारा बताया गय है कि गणित में संख्याओं का निम्नलिखित अनुक्रम हेमचंद्र श्रेणी या फिबोनाची श्रेणी भी आधारित है।

7.आयुर्वेद:

सभी जानते है की आयुर्वेद आज पूरी दुनिया में उपयोग किया जा रहा है। यह भी भारत की ही एक देन है। प्राचीन काल में ऋषिमुनि जंगलों में जड़ी बूटियों से रोग नाशक औषधियां तैयार करते थे। आज यह प्रकिया पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हो गई है ।

8.बुद्धिज्‍म और जैनिज्‍म:

बुद्धिज्‍म और जैनिज्‍म दोनों की उत्‍पत्‍ित भी भारत में ही हुई है। इतिहास में ये सबसे पहले भारत में ही पाए गए। ये भारत में ही सीमित रहे। हालांकि अब कुछ एशियन कंट्रीज में इनकी शाखाएं हैं।

9.सर्जरी:

मोतिया बिंदु और प्लास्टिक सर्जरी जैसी विधियां प्राचीन काल में भारत में की जा चुकी हैं। सर्जरी का मतलब है- ‘शरीर के किसी हिस्से को ठीक करना।’ भारत में सुश्रुत को पहला शल्य चिकित्सक माना जाता है। सुश्रुत प्रसव, मोतियाबिंद, कृत्रिम अंग लगाना, पथरी का इलाज व अंग-भंग हो जाते थे या नाक खराब हो जाती थी, तो उन्हें ठीक करने का काम वे करते थे। उनके पास इससे जुड़े सभी तरह के औजार भी थे |

10.कश्मीरी ऊन:

ऊन का उद्योग 15 वीं शताब्‍दी में कश्‍मीर में शुरू हुआ । यह कश्‍मीर के शासकों की देख रेख में होता था। यहीं से कश्‍मीरी ऊन के शॉल, स्‍वेटर, आदि पूरी दुनिया में पहुंचे ।

11.यूएसबी:

भारत के रहने वाले अजय भट्ट ने यूएसबी डिवाइस बनाई है । उन्‍हें नहीं पता था कि आगे चलकर उनकी यह डिवाइस पूरी दुनिया में एक जरूरी उपकरण के रूप में सामने आएगी। आज दुनिया में यूएसबी का इस्तेमाल करीब 2000 करोड़ लोग कर रहे हैं।

12.ताश:

आज ताश का खेल पूरी दुनिया में मशहूर है। यह भी कार्ड के जरिए खेले जाना वाला एक दिमागी खेल है। इस यह भी भारत की ही देन है। प्राचीन काल में यह क्रीड़ापथरम के नाम से जाना जाता था।

13.पेंटियम चिप:

आज कंप्‍यूटर की सबसे महत्‍वपूर्ण चीज के रूप में गिनी जाने वाले पेंटियम चिप का अविष्‍कार भी भारत में हुआ है। इसका आविष्कार’विनोद
धाम’ने किया था।

14.मिश्री:चीनी यानी की शक्‍कर के दाने भी भारत का ही अविष्‍कार है। यह आज पूरी दुनिया में मिश्री के टुकडे के रूप में पहचानी जाती है। इसकी उत्‍पत्‍ति गुप्‍त के शासन काल में हुई थी।

15.गुरुत्वाकर्षन:

प्राचीन भारत के सुप्रसिद्ध गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री भास्कराचार्य ने इस पर एक ग्रंथ लिखा ‘सिद्धांतशिरोमणि’। उनके इस ग्रंथ का बाद में अनेक विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ।

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