Lord Rama Stories in Hind , भगवान राम के जीवन से जुड़े 5 प्रेरक प्रसंग

अपने पिता महाराज दशरथ की आज्ञा पाकर श्रीराम सीता मैया और लक्षमण जी के साथ 14 वर्ष का वनवास काटने के लिए अयोध्या से प्रस्थान कर गए. इसके बाद वे प्रयाग (इलाहाबाद), चित्रकूट, पंचवटी ( नासिक ), दण्डकारण्य, लेपक्षी, किश्किन्दा, रामेश्वरम, आदि स्थानों पर रहे और इस दौरान उनके साथ कई प्रसंग घटे.


प्रसंग 1 – शूर्पणखा की नाक काटना

जब भगवान् राम पंचवटी में रह रहे थे तभी एक दिन रावण की बहन शूर्पणखा एक सुंदरी का रूप धारण कर उनके पास आई और उनके दिव्य स्वरुप से मोहित हो कर उनसे विवाह करने के लिए कहने लगी.

इस पर श्रीराम ने अपनी पतिव्रता पत्नी सीता के बारे में बताया और कहा कि वह उनके अनुज लक्ष्मण के पास जाए.

जब शूर्पणखा ने लक्षमण जी के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा तो वह बोले, ” हे सुंदरी! मैं तो भगवान् राम का दास हूँ यदि तुमने मुझसे विवाह किया तो तुम्हे भी उनकी दासी बनना पड़ेगा. और यह तो तुम्हारे सम्मान के विरुद्ध होगा. तुम राम भैया के पास जाओ वही सबके स्वामी हैं वही सबकुछ करने में समर्थ हैं.

यह सुनकर शूर्पणखा क्रोध से लाल हो गयी और रामजी से बोली, “शायद तुम्हे मेरी असीम शक्ति का ज्ञान नहीं है, जो तुम मेरे निवेदन को ठुकरा कर मेरा उपहास कर रहे हो.”और ऐसा कह कर वह अपने असली रूप में आ गयी और सीता मैया को खाने के लिए दौड़ी.

यह देख श्री राम ने लक्षमण को उसे दण्डित करने का संकेत दे दिए और लक्षमण जी ने अपनी तलवार से उसके नाक-कान काट दिए.

प्रसंग 2 – खर-दूषण से युद्ध

नाक-कान कटने के बाद शूर्पणखा खून से लथपथ अपने भाइयों खर-दूषण के पास दौड़ी गयी और खर से बोली, “भाई! धिक्कार है तुम्हारे बल और पराक्रम पर. आज तुम्हारे राज्य में साधारण मनुष्यों की हिम्मत इतनी बढ़ गयी है कि उन्होंने मेरा ये हाल करने का दुःसाहस कर दिया है.”
और शूर्पणखा ने अपने साथ घटी घटना बता दी.

यह सुन कर खर क्रोधित हो उठा और तत्काल अपने भाई दूषण और 14 हज़ार राक्षसों की सेना लेकर राम-लक्षमण पर आक्रमण करने के लिए निकल पड़ा. उसकी इस विशाल सेना में एक से बढ़ कर एक पराक्रमी व दिव्यास्त्रों से सुसज्जित राक्षस मौजूद थे.

उनके आने का कोलाहल सुनकर श्रीराम ने लक्षमण जी से सीता मैया को किसी सुरक्षित स्थान पर ले जाने को कहा और स्वयं अपना धनुष और अक्षयबाण वाले दो तरकस बाँध कर तैयार हो गए.

जल्द ही राक्षस वहां आ पहुंचे और नाना प्रकार के अश्त्रों-शश्त्रों से उन पर वार करने लगे. पर श्रीराम ने एक-एक कर के उनके सारे अश्त्र -शश्त्र काट डाले और सहस्त्रों बाणों से खर-दूषण समेत समस्त राक्षसों का संहार कर दिया.

इस प्रकार रघुवंशियों में श्रेष्ठ श्रीराम ने आधे पहर में ही इतनी विशाल और सूरवीरों से भरी सेना को अकेले ही समाप्त कर दिया.

प्रसंग 3 – जटायु पर कृपा

जब मारीच की मदद से रावण सीता मैया का हरण कर अपने पुष्पक विमान से उन्हें लंका ले जा रहा था तब उनकी वेदनापूर्ण पुकार सुन गिद्धराज जटायु उन्हें बचाने के लिए तत्पर हो गया और वायु वेग से रावण की ओर उड़ चला.

जटायु ने अपनी पूरी शक्ति से रावण पर आक्रमण किया और उसे नीचे गिरा दिया. पर अगले ही क्षण रावण ने अपनी कटार से जटायु के पंख काट दिए और पुनः सीताजी को लंका की ओर ले उड़ चला.

उधर जब राम-लक्षमण को सीता जी आश्रम में नहीं मिलीं तो वे फ़ौरन उन्हें ढूँढने निकले. मार्ग में उन्हें घायल अवस्था में जटायु मिला. उसने सिर्फ भगवान् के दर्शन करने के लिए अपने प्राणों को रोक रखा था.

श्रीराम ने रक्त में डूबे जटायु के सिर पर अपना हाथ फेरा. उनका दर्शन व स्पर्श पा कर जटायु की पीड़ा जाती रही और वह बोला, “हे नाथ! लंकापति रावण ने मेरी ये दशा की है. उसने सीता मैया का हरण कर दक्षिण दिशा की ओर रुख किया है… बस यही सूचना देने के लिए मैं अभी तक जीवित था. कृपया मुझे यह शरीर छोड़ने की आज्ञा दीजिये.”

भगवान् राम द्रवित होते हुए बोले-

“हे तात! अपने परहित में अपने तन का त्याग किया है, निश्चित ही आपको मेरे परमधाम की प्राप्ति होगी.”और तत्काल ही जटायु चतुर्भुज रूप धारण कर भगवान् की स्तुति करते हुए परमधाम को चले गये.

प्रसंग 4 – शबरी की भक्ति

सीता जी की खोज करते हुए श्रीराम भक्तिमती शबरी के आश्रम पहुंचे. उन्हें देखते ही शबरी आनंद विभोर हो गयी, वह भगवन के चरणों में गिर पड़ी और उसके नेत्रों से आंसुओं की धारा बहने लगी.इसके बाद उसने राम-लक्ष्मण की पूजा की और खाने के लिए फल प्रस्तुत किये.

 नोट: कई जगह शबरी द्वारा श्रीराम को अपने झूठे बेर खिलाने की बात आती है, पर इस बात को लेकर सभी एकमत नहीं हैं.

शबरी ने बताया कि वह हजारों वर्षों से इस आश्रम में रह रही है और उसके गुरु महर्षि मतंग ने ब्र्हम्लोक जाने से पहेल उसे बताया था कि सनातन परमात्मा ने राक्षसों का संहार करने के लिए और ऋषियों की रक्षा करने के लिए महाराज दशरथ के यहाँ पुत्र रूप में अवतार लिया है और वह शीघ्र तुम्हे दर्शन देने के लिए यहाँ आयेंगे.

शबरी बोली, “हे रघुनन्दन! मैं नीच कुल में उत्पन्न एक अनपढ़ गंवार नारी हूँ. मैं तो आपके दासों का दास बनने योग्य भी नहीं हूँ, फिर भी आपने मुझे दर्शन दिए, मैं नहीं समझ पा रही कि मैं कैसे आपकी स्तुति करूँ.”

भगवान् बोले-

“हे भामिनी! स्त्री-पुरुष, नाम, जाति और आश्रम – ये कोई भी मेरी कृपा के कारण नहीं हैं. मैं तो बस अपने भक्तों के वश में हूँ, और जो मेरी भक्ति करता है वह स्वतः ही मेरी कृपा का पात्र बन जाता है. इसीलिए मैं तुम्हारे पास आया हूँ. मेरे इस दर्शन से तुम्हारी मुक्ति हो जायेगी.”

इसके बाद शबरी ने रावण द्वारा सीता हरण के विषय में बताया और वनराज सुग्रीव से मित्रता करने की बात कही. और फिर शबरी ने श्रीराम के समक्ष ही खुद को योगाग्नि में भस्म कर परमधाम की प्राप्ति की.

प्रसंग 5 – बालि वध

बालि सुग्रीव का बड़ा भाई था. वह अत्यंत बलशाली था और उसे आशीर्वाद प्राप्त था कि जो कोई भी उससे लड़ने आएगा उसकी आधी शक्ति क्षीण हो जायेगी और बालि को प्राप्त हो जायेगी.

बालि ने सुग्रीव की पत्नी पर कुदृष्टि डाली थी और उस पर अपना आधिपत्य जमा सुग्रीव को राज्य से निकाल दिया था.

श्रीराम से मित्रता होने और उनका आश्वासन मिलने के बाद सुग्रीव ने पुनः बालि को युद्ध के लिए ललकारा. इस दौरान श्रीराम एक वृक्ष के पीछे खड़े हो बालि का वध करने का अवसर खोजने लगे.

पर दोनों भाइयों की मुख व काया एक सामान होने के कारण वे समझ ना सके कि किस पर तीर छोड़ा जाए और इस कारण से सुग्रीव को एक बार फिर युद्ध में परास्त हो वापस आना पड़ा.

पर कुछ ही देर में वह पुनः फूलों की एक माला पहन बालि को लकारने पहुंचा. इस बार श्रीराम ने दोनों भाइयों में आसानी से अंतर कर लिया और बालि पर अपना बाण छोड़ दिया.

बालि धराशायी हो गया और तिरस्कार पूर्वक बोला, “हे राम! मैंने आपका क्या बिगाड़ा था जो आपने इस तरह मुझे मारा? एक क्षत्रीय होने के नाते आप सामने से युद्ध करते तब आपका यशगान होता, बताइये इस तरह मुझे मार कर आपको कौन सा पुण्य मिल गया?”

तब श्रीराम ने कहा-

“मैं धर्म की रक्षा करने के लिए ही इस लोक में धनुष धारण कर विचरण कर रहा हूँ. छोटे भाई की स्त्री, बहन, पुत्रवधू और कन्या – ये चारों सामान ही हैं. जो मूढ़ इनमे से एक के साथ भी रमण करता है; राजा का कर्तव्य है कि वह उसे मृत्युदण्ड दे. इसीलिए मैंने तेरे साथ युद्ध नहीं किया अपितु तुझे दण्ड दिया है.”

इसके बाद बालि ने अपनी करनी के लिए क्षमा मांगी और अपने प्राण त्याग दिए और इन्द्र्रूप में देवलोक चला गया.