आपका डर हमलावर वायरस के लिए है खतरनाक हथियार

दुनिया खौफ के साय में है. एक ऐसा हमलावर जो रोजाना सैकड़ों लोगों को अपनी चपेट में ले रहा है. इस हमलावर को हम देख नहीं सकते. इसके खिलाफ कोई हथियार हमारे पास नहीं है. फिलहाल हमें दुबककर और कुछ सावधानियां बरतते हुए इससे बचना होगा. उस पर सोशल मीडिया की अफवाहें खौफ को कई गुना बढ़ा रही हैं. डर (COVID-19)वायरस से संक्रमित होने का भी है तो डर नौकरी जाने का भी है. डर है कि कहीं लॉकडाउन न हो जाए.

डर है कि कोई अपना कहीं इस वायरस का शिकार न हो जाए. कुल मिलाकर डर ही डर है. और यह डर हमें कमजोर कर रहा है. यह केवल मनोवैज्ञानिक (psychologist)तथ्य नहीं है. डर का हमारी फिजियोलॉजी पर बेहद खतरनाक असर पड़ता है. यह डर हमारी इमोशनल हेल्थ को बर्बाद करने के बाद सीधा हमारी प्रतिरोधक क्षमता पर प्रहार करता है.

दरअसल प्रतिरोधक सिस्टम (immune system)कई लाखों कोशिकाओं से मिलकर बनता है. इनमे कुछ कोशिकाओं का काम ही होता है बीमारी से लड़ना और आपको स्वस्थ्य रखना. पूरे शरीर के भीतर यह कोशिकाएं यात्रा करती रहती हैं. इन्हें फाइटर सेल्स (लड़ाकू कोशिकाएं) भी कहते हैं. यह यात्रा बेमकसद नहीं होती.

एक तरह से शरीर के भीतर यह कोशिकाएं चौकन्ने सिपाहियों की टोली की तरह भ्रमण करती रहती हैं. किसी वायरस या बैक्टीरिया ने अंदर प्रवेश किया नहीं कि बर यह टूट पड़ती हैं उसे खत्म करने के लिए. आपको शायद पता हो कि रोजाना हम हजारों वायरस के कॉन्टेक्ट में आते हैं. लेकिन वे हमारा कुछ बिगाड़ नहीं पाते.

हमें इन कोशिकाओं का शुक्रगुजार होना चाहिए. लेकिन सोचिए अगर यही लड़ाकू सिपाही कमजोर पड़ जाएं. कम हो जाएं तो क्या होगा. कमजोर से कमजोर वायरस, बैक्टीरिया हमें धर दबोचेगा. हममे से हर किसी ने एड्स का नाम सुना होगा. दुनियाभर में लोग इससे खौफजदा हैं.

पर यह बीमारी केवल प्रतिरोधक क्षमता (immune system)के कमजोर होने का नतीजा है. हां तो हम दोबारा लौटते हैं डर के विज्ञान पर. दरअसल डर हमारे स्ट्रेस हार्मोन कॉर्टीसोल को को असंतुलित कर इम्मयून सिस्टम को डिस्टर्ब कर देता है.

प्रतिरोधक तंत्र जैसे ही डिस्टर्ब होता है इसका नतीजा सबसे पहले इन लड़ाकू कोशिकाओं पर पड़ता हैं. यह कोशिकाएं कम होने लगती हैं. जैसे-जैसे यह कोशिकाएं कम होंगी हमारा प्रतिरोधक तंत्र भी कमजोर हो जाएगा.

और अगर डर इस हद तक बढ़ जाए कि आप यह तय ही नहीं कर पाएं कि आखिर आप किस बात से डरे हैं और किस बात से नहीं. तो यह हमारी लड़ाकू कोशिकाएं और कमजोर हो जाती हैं.

कुल मिलाकर जब तनाव, चिंता और डर अपनी सीमा पार कर जाता है. आइसोलेशन या अकेलेपन से निपटने का कोई तरीका नहीं सूझता तो फिर हमारी यह लड़ाकू कोशिकाएं बाहर से शरीर में आए वायरस या बैक्टीरिया के प्रति प्रतिक्रिया नहीं दे पातीं. ऐसे में सरकार को चाहिए कि वह मनोवैज्ञानिकों को काउंसलिंग के लिए इस प्रक्रिया में जोड़े. साथ ही हमे हमारी फाइटर सेल्स (लड़ाकू कोशिकाओं ) को कमजोर करने की जगह उनका हौसल बढ़ाना चाहिए.