जब एक राजकुमार बन गया संन्यासी, उनके तप और ज्ञान के आगे नतमस्तक हो गयी दुनिया

बौद्ध धर्म को दुनिया भर के चार बड़े धर्मों में से एक माना जाता है और गौतम बुद्ध को इस धर्म का संस्थापक कहा जाता है।

आज अगर दुनिया भर में बौद्ध धर्म के अनुयायियों की संख्या लगातार बढ़ रही है तो इसका सारा श्रेय गौतम बुद्ध को जाता है।


जी हां गौतम बुद्ध, एक राजकुमार होते हुए भी जिसमें कभी राज सिंहासन पाने की लालसा नहीं थी। संन्यास जीवन ने उन्हें इस कर प्रेरित किया कि उन्होंने संन्यासी बनने के लिए अपने गृहस्थ जीवन के साथ सभी सांसारिक सुखों का त्याग कर दिया।

आइए जानते हैं गौतम बुद्ध के जीवन के कुछ खास पहलुओं पर जिसने उन्हें एक राजा से संन्यासी बनने पर मजबूर कर दिया।

गौतम बुद्ध जन्म

गौतम बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व नेपाल के लुम्बिनी वन में हुआ। उनकी माता कपिलवस्तु की महारानी महामाया देवी जब अपने नैहर देवदह जा रही थीं, तो उन्होंने रास्ते में लुम्बिनी वन में बुद्ध को जन्म दिया।

गौतम बुद्ध का मूल नाम ‘सिद्धार्थ’ था। सिद्धार्थ के पिता शुद्धोदन कपिलवस्तु के राजा थे। सिद्धार्थ की मौसी गौतमी ने उनका लालन-पालन किया क्योंकि सिद्धार्थ के जन्म के सात दिन बाद ही उनकी माँ का देहांत हो गया था।


16 साल की उम्र में विवाह

शाक्य वंश में जन्मे सिद्धार्थ का सोलह वर्ष की उम्र में दंडपाणि शाक्य की कन्या यशोधरा के साथ विवाह हुआ। यशोधरा से उनको एक पुत्र मिला जिसका नाम राहुल रखा गया।

इन दृश्यों ने किया था विचलित

एक दिन जब सिद्धार्थ रथ पर सवार होकर कपिलवस्तु के भ्रमण के लिए निकले तब उन्होंने रास्ते में चार अलग-अलग दृश्यों के देखा जिससे वो काफी विचलित हुए।
1 – एक बूढ़ा व्यक्ति
2 – एक बीमार व्यक्ति
3 – एक मृत आदमी का शव
4 – एक संन्यासी

इन चारों दृश्यों को देखने के बाद सिद्धार्थ के मन में सांसारिक जीवन के प्रति विरक्ति की भावना ने घर कर लिया।


सांसारिक जीवन का किया त्याग

सांसारिक समस्याओं से दुखी होकर सिद्धार्थ ने 29 साल की उम्र में अपना राज-पाट, अपनी पत्नी और बच्चे को छोड़कर संन्यासी जीवन को अपनाया।

हालांकि उनके घर छोड़ने को लेकर कुछ विद्वानों का मत है कि गौतम ने यज्ञों में हो रही हिंसा के कारण गृहत्याग किया था जबकि दूसरे विद्वानों के अनुसार गौतम ने दूसरों के दुख को न सह सकने के कारण घर छोड़ा था।


सालों की घोर तपस्या के बाद मिला ज्ञान

बिना अन्न जल ग्रहण किए सिद्धार्थ ने करीब 6 साल तक कठिन तपस्या की। जिसके बाद करीब 35 साल की आयु में वैशाख की पूर्णिमा की रात निरंजना नदी के किनारे, पीपल के पेड़ के नीचे सिद्धार्थ को ज्ञान प्राप्त हुआ।

ज्ञान प्राप्ति के बाद सिद्घार्थ गौतम बुद्ध के नाम मशहूर हुए और जिस जगह उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ उसे बोधगया के नाम से जाना जाता है, जो अब बिहार में है।


गौतम बुद्ध के सिद्धांत

ज्ञान प्राप्त करने के बाद वैसे तो गौतम बुद्ध ने इंसानों के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा भरने के लिए कई सिद्धांत कई उपदेश दिए जिससे यह साबित होता है कि इंसान का दिमाग ही उसकी तमाम खुशियों और गमों के लिए ज़िम्मेदार होता है।

गौतम बुद्ध ने जीवन जीने का फ़लसफ़ा बताते हुए कहा है कि हर इंसान के अंदर ही शांति का वास होता है जबकि वो उसे बाहरी दुनिया में तलाश करता है। इंसान अपने विचार, अपने व्यवहार और अपने नज़रिए में सकारात्मक बदलाव लाकर अपनी तमाम परेशानियों को खुद-ब-खुद खत्म कर सकता है।

खुद की परेशानियों को लेकर कई बार हमारे दिमाग में द्वंद चलता है, जिसे सिर्फ हम अपने भीतर सकारात्मक परिवर्तन लाकर ही दूर कर सकते हैं।


आखिरी सांस तक किया धर्म का प्रचार

बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ में दिया जिसे बौद्ध ग्रंथों में धर्मचक्र प्रवर्तन कहा जाता है। वे 80 वर्ष की उम्र तक अपने धर्म का संस्कृत के बजाय उस समय की सीधी सरल लोकभाषा पाली में प्रचार करते रहे।

बुद्ध की मृत्यु 80 साल की उम्र में कुशीनारा में चुन्द द्वारा अर्पित भोजन करने के बाद हो गई, जिसे बौद्ध धर्म में महापरिनिर्वाण कहा गया है। बहरहाल ये राजकुमार सिद्धार्थ के त्याग और बलिदान का ही नतीजा है कि आज उन्हें पूरी दुनिया गौतम बुद्ध कहकर पुकारती है और उनकी कठोर तपस्या से मिलनेवाले ज्ञान की बदौलत ही आज बौद्ध धर्म दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा धर्म माना जाता है।

इस धर्म को मानने वाले ज्यादातर चीन, जापान, कोरिया, थाईलैंड, कंबोडिया, श्रीलंका, नेपाल, भूटान और भारत जैसे कई देशों में रहते हैं।
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