हमारे कल के लिए 22 साल की उम्र में इन्होने देश के लिए अपने प्राण दे दिए - सलाम है इन्हे

ग्वालियर, वही ग्वालियर जिसने हिन्दुस्तान के इतिहास के कई पन्ने लिखे हैं। इस बार उसी ग्वालियर को इतिहास के पन्नों में खुद के लिए जगह मिल गई थी। जो हिस्सा सोने से लिखा गया। तारीख 12 दिसम्बर 1998, 2-राजपूताना राइफ़ल्स को अपना अगला हीरो मिल गया था, जिसने ग्वालियर में अपनी पलटन को पहली सलामी दी और आखिरी सालामी कारगिल में पूरे देश से ली।


तारीख 25 मई 1999, पूरी पलटन को द्रास पहुंचने का आदेश मिला। पलटन हाज़िर थी। पलटन भी वो जिसने सिर्फ़ इतिहास लिखना सीखा है – राजपुताना राइफल्स। ऑपरेशन था टाइगर हिल, तोलोलिंग में घुसे दुश्मनों को निकाल फेंकना। पलटन निकली और अपना काम कर दिया। तोलोलिंग फिर से सिर उठाये चीख रहा था, कोई है इस दुनिया में जो राजपुताना की इस टोली का सामना कर सके। और यहां से राजपुताना के इस हीरो ‘कैप्टन विजयंत थापर’ का कारगिल का सिलसिला शुरु हो चुका था।




26 दिसम्बर 1976 पंजाब की ज़मीं को एक और वीर पैदा करने का सौभाग्य हुआ। कर्नल वि.एन. थापर को बेटा हुआ था। कर्नल वि.एन. थापर तब पठानकोट में ही पोस्टेड थे। पिता ने इस बच्चे का नाम रखा ‘विजयंत’। आर्मी वाले का बच्चा था कोई आम बात नहीं, नाम भी मिला तो उस वक़्त की एक आर्मी बैटल टैंक के नाम पर। यही विजयंत कर्नल विजयंत बना। रहने वाले तो नॉएडा के थे लेकिन पोस्टिंग के दौरान कई जगहों पर तबादला होता रहता। साथ में विजयंत को भी जगहें बदलनी पड़ती। बचपन के शुरूआती कुछ दिन कोलकाता के बैरकपूर में बीते। बाद में पढ़ाई मेरठ के सेंट मैरी अकादमी, फिर सेंट जोसफ, आर्मी पब्लिक स्कूल और आखिर में चंडीगढ़ के डीएवी कॉलेज से स्कूली पढाई के आखिरी दिन।



पहुंच गए दिल्ली। एडमिशन लिया खालसा कॉलेज, दिल्ली यूनिवर्सिटी में। ग्रेजुएशन खत्म किया, इंडियन मिलिट्री अकादमी पहुंचा। देहरादून। और फिर जॉइन किया ग्वालियर में राजपुताना राइफ़ल्स।


अब वापस कारगिल वॉर पर:

तोलोलिंग जीतने के बाद, विजयंत को ब्लैक रॉक कॉम्प्लेक्स में ‘थ्री पिमपल्स और नॉल’ को कैप्चर करने का टास्क मिला। तोलोलिंग और टाइगर हिल के बीच की ये बेहद ही खतरनाक और सबसे मुश्किल चोटियां। ये पूर्णिमा की रात थी। सब कुछ दूर से चमक जाए। ऊपर से दुश्मन जब पहले से ही ऊपर बैठा हो। नीचे से चढ़ाई। 15000 फीट की ऊंचाई पर लगभग सीधी-सी चढ़ाई। और ठंड 15 डिग्री (-15 डिग्री)।



इसके बावजूद भी इतनी मुश्किल चढ़ाई कर ली गई थी। दुश्मनों से गोलीबारी जारी थी। ऊपर बेहतर जगह पर तैनात दुश्मनों के तेज़ हमले के बावजूद पूरी टीम आगे बढ़ रही थी। इस दौरान कैप्टन विजयंत के कई जवान शहीद हो गए। टुकड़ी थोड़ी बिखर गई थी। फिर से विजयंत ने सब को जमा किया और अब ये नॉल की चोटी पर एक छोटा हिस्सा भी अपने कब्ज़े में ले चुके थे। लेकिन इस वक़्त तक कंपनी के कमांडर मेजर पी. आचार्य शहीद हो चुके थे।

ख़बर मिलते ही इस फौजी घराने के लड़के से रहा नहीं गया। और कप्तान अपनी पलटन लिए उस पतली चोटी की ओर बढ़ गया। साथ में था एक जवान, नायक तिलक सिंह। सिर्फ़ 15 मीटर की दूरी और दुश्मनों का दो मशीन गन एक साथ इनपर बरस रहा था। लगभग डेढ़ घंटे से ज्यादा देर तक ये सब कुछ चलता रहा। और इस कप्तान ने आखिरकार दुश्मनों को खत्म करने की सोच ली।

इस जल्दबाज़ी में वो तेजी से उस ओर बढ़ गया। तभी एक गोली सीधे इस कप्तान के सिर में लगी और 22 साल का विजयंत वहीं उस नायक तिलक सिंह की गोद में शहीद हो गया। तारीख थी 29 जून 1999। विजयंत ने अभी सिर्फ़ 6 महीनों की सर्विस पूरी की थी। इसके बाद जवानों ने चोटी फतह कर ली।

naayak tilak singh 

मरणोपरांत भारत सरकार ने कप्तान विजयंत थापर को वीर चक्र प्रदान किया था। नॉएडा में एक सड़क का नाम भी इस कप्तान को समर्पित किया गया है।

शहीद कप्तान विजयंत थापर को गजब दुनिया सलाम करता है!

Image source : captainvijyantthapar.com
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