पढ़िए खुशबू के संसार की उत्पत्ति की कहानी

एक लड़का है वो अपने शरीर पर कुछ छिड़कता है और अचानक ही हज़ारों की संख्या में लड़कियां उसके पीछे भागने लगती हैं। एक विज्ञापन का ये सीन देखकर लड़के काफ़ी इंस्पायर हुए हैं। उन्हें लगता है कि जितनी अधिक मात्रा में उस दिव्य पदार्थ की कुछ बूंदें वो अपने शरीर पर छिड़क लेंगे उतनी लड़कियां उनके पीछे हो लेंगी। लड़कियां भी कम नहीं हैं वो भी मग भर-भर इससे नहाती हैं।


ये दिव्य पदार्थ और कुछ नहीं बल्कि परफ़्यूम है। उम्मीद है आप सब भी इसके पीछे पागल होंगे। पर क्या आपको परफ़्यूम के पीछे की कहानी पता है? मतलब इसका इतिहास, कि ये कब, कैसे और किसके लिए अस्तित्व में आया?





इजिप्ट के मकबरों की दीवारों पर जो चित्र बने हुए हैं वो बताते हैं कि हज़ारों साल पहले से ही लोग अपने आस-पास खुशबू बिखेरने के पीछे पागल रहते थे। इजिप्ट के पुजारियों को मॉडर्न परफ़्यूम का पिता कहा जाता है। वो इन खुशबुओं का इस्तेमाल देवताओं को बलि देने के दौरान किया करते थे। इससे बदबू को ढका जा सकता था। उनका मानना था कि इन खुशबुओं से देवता प्रसन्न होते हैं। वो “myrrh”, “sweet rush”, “wine” और “juniper” को मिलाकर रोज़ रात को जलाकर सूर्य देवता को प्रसन्न करते थे ताकि वो हर सुबह वापस लौट कर आएं।



उस समय बड़े पुजारियों और राजाओं को भारी खुशबू के साथ दफ़नाया जाता था। ये ख़ुशबू इतनी तेज़ होती थी कि जब पुरातत्वेत्ता इन्हें खोलते थे तो उन्हें ये गंध हज़ारों सालों के बाद भी पता चलती थी। उस समय परफ़्यूम्स बनाने के लिए “jasmine, frankincense resin, madonna lilies और honey” आदि का प्रयोग किया जाता था।

इजिप्ट की महान महारानी क्लियोपेट्रा जब समुन्दर में निकलती थीं तो अपने जहाज़ को सुगन्धित तेल से पूरी तरह सराबोर करवा देती थीं जिससे मार्क एंटोनी को दूर से ही उसके आने का पता चल जाए। रोम में फ़व्वारों से गुलाब जल गिरता था जिससे कि आस-पास उसकी महक बरकरार रहे। ग्रीक लोगों ने पहली बार कुछ सुगन्धित तेल और जड़ीबूटियों को मिलाकर स्किन पर इस्तेमाल होने वाला परफ्यूम बनाया। और धीरे-धीरे लोग उसे रोज़मर्रा में इस्तेमाल में लेकर आने लगे।



कुछ खुशबुओं को स्पर्म व्हेल की अंतड़ियों में बनाया जाता था तो कस्तूरी मृग से एक musk खुशबू ली जाती थी। इस वजह से जानवरों को भारी संख्या में मौत के घाट उतार दिया जाता था। सत्रहवीं शताब्दी में फ्रांस के राजा लुइ14 ने हर दिन के लिए एक नई खुशबू बनाने के आदेश दे डाले। सोचिए ये कितना मुश्किल रहा होगा।

पर इन सब से पहले सिंधु घाटी की सभ्यता से ही परफ़्यूम का निर्माण होता चला आ रहा है। इसके साथ ही चक्र संहित और सुश्रुत संहित यानी आयुर्वेद में भी इत्र के बारे में पढ़ने को मिल जाता है। मेसोपोटामिया से प्राप्त अभिलेखों में भी एक “tuputti” नाम की महिला का उद्धरण देखने को मिलता है जो कि मुख्य तौर पर इन खुशबुओं को तैयार करने के लिए जानी जाती थी। 2004 में पुरातत्ववेत्ताओं को Pyrgos, Cyprus में आज से करीब 4000 साल पुराने परफ़्यूम मिले। इन्हें करीब 4000 स्क्वायर-मीटर एरिया वाली एक जगह में तैयार किया जाता था। उन्हें वहां से वो बर्तन भी प्राप्त हुए जिनमें इन्हें तैयार किया जाता था।


कुलमिलाकर दोस्तों गलती आपकी नहीं है। खुशबूदार रहने की ये आदत हज़ारों साल पहले ही हमारे पूर्वजों ने हमारे अन्दर डाल दी थी जिसे हम आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए नए सिरे से तैयार कर रहे हैं। हालांकि आज जिस तरह से इन्हें तैयार किया जाता है उससे हमारे वातावरण को और हमारी त्वचा को नुक्सान ही होता है। पर इसके बावजूद परफ़्यूम का बाज़ार दिन दोगुना रात चौगुना की रफ़्तार से फल-फूल रहा है।

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