आज सजता है ’जिस्म का बाज़ार’ जंहा कभी ढोलक की थाप, घुंघरुओं की छन-छन और हारमोनियम की तान पर थिरकते थे पांव

दरख्तों दीवारों पर टंगी तख्तियां अब धुंधली सी हो गई है, जिन पर कला, संगीत और नृत्य के असल कद्रदानों-प्रेमियों के पहुंचने के ठिकाने का ज़िक्र होता था। कल तक यह कला, संगीत और नृत्य का मशहूर केंद्र था, आज यह हुस्न का बाज़ार बन कर सिमट गया है। माफ कीजिए हुस्न का बाजार नहीं जिस्म का बाजार। लेकिन उन तवायफों की बेबस आंखों में एक बार गौर से देखिये, आपको उनका चमकता इतिहास नज़र आयेगा।



ढोलक की थाप, घुंघरुओं की छन-छन और हारमोनियम की तान पर थिरकते पांव ही इसकी पहचान को बताने के लिए काफ़ी है। बिहार के मुजफ़्फ़रपुर जिले के 'चतुर्भुज स्थान' नामक जगह पर स्थित वेश्यालय का इतिहास मुगलकालीन है। यह जगह भारत-नेपाल सीमा के पास है। यहां तकरीबन 10 हजार की आबादी है और वेश्यावृत्ति पारिवारिक व पारंपरिक पेशा है, यानि मां के बाद उसकी बेटी की नियति भी यह पेशा ही है।

एक समय हुआ करता था जब लखनऊ, बनारस जैसे संगीतमय वातावरण को छोड़ लोग यहां आकर गाने में फ़क्र महसूस करते थे। पन्नाबाई, भ्रमर, गौहरजान और चंदाबाई जैसे नगीने किस प्रकार मुजफ़्फ़रपुर के इस बाज़ार में आये और किस तरह अपनी जिंदगी को आबाद करके, वे यहां से चले गये? तवायफ़ कितने प्रकार की होती हैं? और उनकी ज़िंदगी की क्या ठसक और कसक थी? मुजफ़्फ़रपुर ही नहीं, बल्कि समस्तीपुर, सीतामढ़ी और नेपाल तक में इनकी कितनी पैठ थी? कितने ऐसे हुए, 


जो इन तवायफ़ों से ठोकर खाकर अपमान और ज़लालत की ज़िंदगी ही नहीं झेले, बल्कि उसी चतुर्भुज मंदिर के पास फटेहाल भीख मांगने को भी मजबूर हुए? समय के साथ चतुर्भुज स्थान का सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिदृश्य बदलता चला गया। मुजरा के साथ-साथ ठुमरी और दादर जैसे संगीतों का दिन ढलने लगा।



आधुनिकता के दौर में गीतों के साथ नाच का जो प्रचलन शुरू हुआ, वह चतुर्भुज स्थान जैसे संगीत और कला के समृद्ध केंद्र को पतन की ओर धकेलने लगा। सिनेमाघरों की शुरुआत ने भी इनकी ज़िंदगी के मायने ही नहीं बदले, बल्कि जीने और कला-प्रदर्शन के तरीके को भी बदल डाला। बाज़ार में कला, कला ना रह कर एक बाज़ारू वस्तु बन गई। बाद के दिनों में तो शामियाने में गोलियों की बौछार होने लगी। चंदाबाई का नाम सुनते ही टेंट वाले, टेंट का पूरा दाम पहले ही वसूल लेते थे। 1980 के बाद के दिनों में तो देर रात छापेमारी और होटलों में तवायफों के मरने की भी बातें आम होने लगीं।

मजे की तो बात ये है कि गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर ने ही इस धरती पर अपने पैर नहीं रखे, बल्कि शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की पारो के रूप में सरस्वती से भी यहीं मुलाकात हुई थी। और यहां से लौटने के बाद ही उन्होंने 'देवदास' की रचना की थी। बताया तो यह भी जाता है कि पृथ्वीराज कपूर जानकी वल्लभ शास्त्री के पास अकसर यहां आते थे।

यूं तो चतुर्भुज स्थान का नामकरण चतुर्भुज भगवान के मंदिर के कारण हुआ था, लेकिन लोकमानस में इसकी पहचान वहां की तंग, बंद और बदनाम गलियों के कारण है, जहां अहले सुबह से लेकर देर रात तक नाल, ढोलक और घुंघरुओं की आवाज के साथ कभी सुरों की महफिल सजती थी। वह महफिल अब भी सजती है, लेकिन बदरंग फिल्मी और कामुक आइटम गीतों के बीच कहीं दबकर रह जाती है। कद्रदान घटे, तो तवायफ़ों ने भी अपने काम से तौबा कर देह के धंधे को सुगम रास्ते के तौर पर चुन लिया। चतुर्भुज स्थान के करीब 600 घरों में बसने वाली 10 हजार की आबादी की नियति अब ऐसी ही है।

शेष भारत की बात न भी करें, तो सिर्फ़ बिहार के 38 जिलों में 50 रेड लाइट एरियाज़ हैं, जहां दो लाख से अधिक आबादी बसती है। 80 प्रतिशत घरों से कर अदायगी होती है। इन रेड लाइट इलाकों की बसावट 200 साल पूर्व से लेकर दो साल पहले तक की है। यह बात कोई हवाबाजी नहीं, बल्कि सी-वोटर के व्यापक सर्वेक्षण में सामने आई है।

कल तक जिन आंखों का दीदार करना, जिनके नृत्य-संगीत का दीदार करना राजा-महाराजा से लेकर जमींदार तक अपनी शान माना करते थे, आज उन्हीं आंखों के दीदार से हमारी शान गिरने लगी है। ऐसा कहा जाता है कि लखनऊ के नवाब से लेकर दरभंगा महाराज तक, कई बड़े नाम चतुर्भुज स्थान के मुजरों के दीवाने हुआ करते थे। राजाओं की महफिल भी वहीं सजती थी, लेकिन आज न वो महफिल है और न कद्रदान। वहां कुछ है तो सिर्फ़ और सिर्फ़ जिस्मफरोशी का धंधा।
Source- hindishabdjaal, dictaficta.com and mohallalive
आज सजता है ’जिस्म का बाज़ार’ जंहा कभी ढोलक की थाप, घुंघरुओं की छन-छन और हारमोनियम की तान पर थिरकते थे पांव आज सजता है ’जिस्म का बाज़ार’ जंहा कभी ढोलक की थाप, घुंघरुओं की छन-छन और हारमोनियम की तान पर थिरकते थे पांव Reviewed by Gajab Dunia on 1:38 AM Rating: 5