पहाड़ों और समंदर के बीच से गुजरती है इंडियन रेलवे, 'मेट्रोमैन' का पहला करिश्मा...

‘तू किसी रेल सी गुजरती है... मैं किसी पुल सा थरथराता हूं...’ दुष्यंत कुमार की इन पंक्तियों को अगर आपको देश में किसी रेल यात्रा के दौरान महसूस करना हो तो आप कोंकण रेलवे की यात्रा पर निकल सकते हैं। 

महाराष्ट्र के रोहा से शुरू होकर कर्नाटक के ठोकुर तक जाने वाली ये लाइन भारतीय रेलवे के इतिहास में मील का पत्थर है, ये तस्वीरें आपको यही बताएंगी...



यह रेल लाइन सैंडविच में उस आलू की तरह जिसके एक तरफ का ब्रेड पश्चिमी घाट की खूबसूरत पहाड़ियां हैं तो दूसरी तरफ का ब्रेड अरब सागर...कोंकण रेलवे देश की ऐसी रेलवे लाइन है जो पश्चिमी घाट में अरब सागर के समानांतर चलती है।




इस रेल रूट का निर्माण और संचालन कोंकण रेलवे ही करती है। अपने पूरे सफर के दौरान यह कई नदियों, पहाड़ों और अरब सागर को पार करते हुए गुजरती है। ये दुर्गम इलाके ही वो कारण थे जिन्होंने इस रेलवे लाइन के निर्माण को लगभग नामुमकिन सा बना दिया था।




एक बार जब इसका निर्माण पूरा कर लिया गया इसने अद्भुत नजारों की एक श्रृंखला में खुद को समाहित सा कर लिया। इस रेल रूट पर 2 हजार पुल, 92 सुरंगे बनाई गई हैं। एक जानकारी के मुताबिक इस लाइन का निर्माण 20वीं शताब्दी में पूरे किए गए सबसे मुश्किल कामों में से एक था।



कोंकण रेलवे की जरूरत क्यों पड़ी?: भारतीय रेलवे दुनिया की चौथी सबसे बड़ी रेल नेटवर्क है। जिस वक्त कोंकण रेलवे के निर्माण की कल्पना उठी, देश के लगभग सभी हिस्से, पूर्वोत्तर को छोड़कर रेलवे के नक्शे पर थे। अंग्रेज भी इस बात को जानते थे कि देश के कोंकण क्षेत्र में रेलवे का निर्माण बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य है। इसमें मानवशक्ति के अलावा ढेरों धन भी खर्च होता।




यह पर्यावरण की चुनौती भी व्यापक है। बरसात के मौसम में यह रेल लाइन का निर्माण करना बड़ी चुनौती थी क्योंकि देश के इस हिस्से में सबसे ज्यादा वर्षा होती है। समस्या सिर्फ मौसम की ही नहीं थी। बल्कि 42 हजार जमीन मालिकों के साथ समझौते से भी जुड़ी हुई थी।




लेकिन इन सब वजहों से परियोजना लगातार टलती जा रही थी और इससे व्यापार और माल ढुलाई में खासी परेशानी आ रही थी। स्थानीय कारोबारियों को लंबी यात्रा करनी पड़ी रही थी और इससे यातायात का खर्च भी बढ़ रहा था। आखिरकार 15 सितंबर 1990 के दिन कोंकण रेलवे के निर्माण को मंजूरी दे दी और रोहा में इसकी आधारशिला रखी गई।



रेलवे का निर्माणः डॉ. ई. श्रीधरन को कोंकण रेलवे का डायरेक्टर बनाया गया और उन्हें नियुक्ति से लेकर काम करने का पूरा अधिकार दिया गया। आपको कुछ याद आया हो तो हम इसकी पुष्टि कर दें, ये दिल्ली मेट्रो वाले मेट्रोमैन श्रीधरन ही थे।



पूरी लेंथ को 7 हिस्सों में बांटा गया जिसे एक चीफ इंजीनियर हेड कर रहा था, उसे रेलवे को पास कराने के लिए सर्वश्रेष्ठ रास्ता तैयार कराने की जिम्मेदारी दी गई। इसके लिए सैटेलाइट तस्वीरों और लंबे सर्वे के काम को पूरा किया गया।




जमीन अधिग्रहण के लिए स्थानीय पंचायत और नेताओं से संपर्क किया गया। मिट्टी के प्रकार और पेड़ों की मात्रा के हिसाब से मुआवजा तय किया गया। रेलवे में नौकरी का भरोसा भी दिया गया।




L&T, AFCONS को चार्ज दिया गया और बड़ी टनल बोरिंग मशीन (टीबीएम) को स्वीडन से मंगाया गया। 5 साल की समयसीमा के लिए 30 हजार वर्करों को काम पर लगाया गया। हालांकि इस प्रोजेक्ट को पूरा होने में 7 साल लग गए और 93 मजदूरों को अपनी जान भी गंवानी पड़ी। लेकिन एक बार काम पूरा हो जाने के बाद मुंबई से गोवा और कोच्चि का सफर 10 से 12 घंटे तक कम हो गया।




रेल लाइन का सफरः कोंकण रेलवे के रास्ते में चिपलूण, रत्नागिरी जैसे स्टेशन आते हैं। महाराष्ट्र में कणकावली कोंकण रेल का प्रमुख रेलवे स्टेशन है। यहां स्टेशनों पर कोई भीड़भाड़ नहीं दिखाई देती। महाराष्ट्र का रत्नागिरी जिला हालांकि विकास के मामले में पिछड़ा है लेकिन खूबसूरती में गोवा का मुकाबला करता है।



कोंकण रेल मार्ग पर गोवा के दो बड़े स्टेशन आए थिविम जंक्शन और मडगांव जंक्शन आते हैं। कोंकण रेल के सफर के दौरान रेल की खिड़की से नदियां, पहाड़ और हरियाली देखते देखते आपकी आंखे थक जाएंगी लेकिन नजारे खत्म होने का नाम नहीं लेंगे।




रेल एक सुरंग में घुसती है, निकलने के बाद दूसरे सुरंग में घुस जाती है। पहाड़ों को काटकर कोंकण रेल के लिए रास्ते बनाए गए हैं। एक तरफ ऊंचे पहाड़ तो दूसरी तरफ गहरी खाई। कोंकण रेल गोवा का बड़ा इलाका तय करते हुए आगे बढ़ती है। रास्ते में काफी दूर तक एक तरफ गोवा का समंदर दिखाई देता है।




देश के पश्चिमी तट पर 760 किलोमीटर का सफर कराती है कोंकण रेल। गोवा में कोंकण रेल 105 किलोमीटर का सफर करती है जिसमें जुआरी नदी पर बना पुल अद्भुत है।
कोंकण रेल मार्ग पर कारबुडे सुरंग सबसे लंबी है। ये 6.5 किलोमीटर लंबाई की है। ट्रेन को 30 किलोमीटर प्रति घंटे की स्पीड से इस सुरंग को पार करने में 12 मिनट से ज्यादा वक्त लग जाता है। कर्नाटक में कारवार भटकल उडुपी जैसे शहरों से गुजरती हुई कोंकण रेल मार्ग पर ट्रेन सुहाने सफर को तय करती हुई ट्रेन पहुंच जाती है कर्नाटक के मंगलोर।



कुल रेलवे स्टेशन – 59 ... कुल दूरी 760 किलोमीटर.. बड़े पुल 179 छोटे पुल 1819.. कुल तीखे मोड 320.. कुल सुरंगे -91
प्रमुख स्टेशन – वीर, खेड, चिपलूण, संगमेश्वर, रतनागिरी, राजापुर, वैभववाडी रोड, कनकावली, सिंधुदुर्ग, कुदल, स्वतंत्रवाणी।



रोरो सेवा - रोरो मतलब रोल ऑन रोल ऑफ। इसमें माल से लदे ट्रक सीधे रेलवे वैगन पर लोड कर दिए जाते हैं। उनका पड़ाव आने पर उन्हें फिर रेलवे से सीधे सड़क पर उतार दिया जाता है। यह अनूठी सुविधा कोंकण रेलवे में उपलब्ध है। 26 जनवरी 2016 को कोंकण रेल सेवा ने सफल 18 साल पूरे कर लिए हैं।
पहाड़ों और समंदर के बीच से गुजरती है इंडियन रेलवे, 'मेट्रोमैन' का पहला करिश्मा... पहाड़ों और समंदर के बीच से गुजरती है इंडियन रेलवे,  'मेट्रोमैन' का पहला करिश्मा... Reviewed by Gajab Dunia on 10:58 AM Rating: 5