इस किले के खूनी दरवाजे से हर समय टपकता था खून

चंबल नदी के किनारें बसे अटेर दुर्ग की ऐतिहासिक इमारत आज भी भदावर राजाओं की शौर्यगाथाओं को बयां करती है। शौर्य के प्रतीक लाल दरवाजे से ऐतिहासिक काल में खून टपकता था, इस खून से तिलक करने के बाद ही गुप्तचर राजा से मिल पाते थे। आज भी इस दरवाजे को लेकर कई कहानियां प्रचलित है। खूनी दरवाजे का रंग भी लाल है। इस के ऊपर वह स्थान आज भी चिन्हित है जहां से खून टपकता था।



अटेर का किला


यह एक मध्ययुगीन किला है। यह किला चंबल नदी के उत्तरी किनारे पर स्थित है जो अपनी महिमा के साथ – साथ अपनी भव्यता के लिए विख्यात रहा है। अटेर का किला चम्बल नदी के किनारे एक ऊंचे स्थान पर स्थित है। महाभारत में जिस देवगिरि पहाड़ी का उल्लेख आता है यह किला उसी पहाड़ी पर स्तिथ है। इसका मूल नाम ‘देवगिरि दुर्ग’ है।

हिन्दू और मुगल स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है


इस किले का निर्माण भदौरिया राजा बदनसिंह ने 1664 ई. में शुरू करवाया था। भदौरिया राजाओं के नाम पर ही भिंड क्षेत्र को पहले ‘बधवार’ कहा जाता था। गहरी चंबल नदी की घाटी में स्थित यह किला भिंड जिले से 35 कि.मी. पश्चिम में स्थित है। भदावर राजाओं के इतिहास में इस किले का बहुत महत्व है। यह हिन्दू और मुगल स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है।

खूनी दरवाजा


‘खूनी दरवाज़ा’, ‘बदन सिंह का महल’, ‘हथियापोर’, ‘राजा का बंगला’, ‘रानी का बंगला’ और ‘बारह खंबा महल’ इस क़िले के मुख्य आकर्षण हैं। लेकिन इस महल की सबसे चर्चित चीज है खुनी दरवाजा।

दरवाजे के ऊपर भेड़ का कटा सर रखा जाता था


भदावर राजा लाल पत्थर से बने दरवाजे के ऊपर भेड़ का सिर काटकर रख देते थे, दरवाजे के नीचे एक कटोरा रख दिया जाता था। इस बर्तन में खून की बूंदें टपकती रहती थी। गुप्तचर बर्तन में रखे खून से तिलक करके ही राजा से मिलने जाते थे, उसके बाद वह राजपाठ व दुश्मनों से जुड़ी अहम सूचनाएं राजा को देते थे। आम आदमी को किले के दरवाजे से बहने वाले खून के बारे में कोई जानकारी नहीं होती थी।

दरवाजे से टपकता था खून


अटेर दुर्ग के ऐतिहासिक प्रवेश द्वार का निर्माण राजा महासिंह ने कराया था। इस दुर्ग की जनश्रुतियां आज भी प्रचलित है। लाल पत्थर से बना यह प्रवेश द्वार आज भी खूनी दरवाजे के नाम से प्रचलित है।

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The Ater Fort was built by Bhadauria King Badan Singh, Maha Singh and Bakhat Singh in the era of 1664-1668.The area is known after them as "BADHWAR". The fort is located deep inside the ravines of Chambal. Now it is in a dilapidated condition.
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