काशी तो बनारस में है पर क्या आपको पता है गुप्‍त काशी के बारें में

भगवान शिव की नगरी के रूप में विख्यात उत्तर प्रदेश में काशी यानि वाराणसी तो हिंदू धर्मावलंबियों की आस्था के केंद्र के रूप में पूरी दुनिया में अहम स्थान रखती है, लेकिन क्या आपको पता है कि झारखंड में भी एक छोटी सी काशी है। 

यह काशी झारखंड की उप राजधानी दुमका जिले के शिकारीपाड़ा प्रखंड में मलूटी गांव है। जहां वाराणसी विश्व पटल पर अपनी छटा बिखेर रहा है, वहीं मलूटी सदियों से गुमनामी की चादर ओढ़े है। मलूटी को यहां के लोग गुप्त काशी नाम से भी पुकारते हैं।



500 साल पुराना इतिहास

करीब 500 साल पूर्व मलूटी क्षेत्र के राजा बाज बसंत राय के समय में यहां 108 मंदिरों की शृंखला का निर्माण कराया गया था। उस समय वाराणसी में भी इतनी ही संख्या में मंदिर थे। मलूटी में भगवान शिव के अलावा माता पार्वती, भगवान श्रीगणेश, दुर्गा, काली, हनुमानजी आदि के मंदिर हैं। यहां काशी के दशासुमेध मठ, बनारस के महंत का आना-जाना लगा रहता है। वही यहां पूजा-पाठ कराते हैं। यह परंपरा मंदिर निर्माण काल से चली आ रही है। जाहिर है वाराणसी से मलूटी का अभिन्न जुड़ाव है।


मलिन पड़ा मलूटी :

प्रतिवर्ष रंग रोगन के चलते जहां वाराणसी के मंदिरों की चमक बरकरार है, वहीं मलूटी के मंदिर उपेक्षा के कारण मलिन पड़ गये हैं। 36 मंदिरों का तो अस्तित्व ही समाप्त हो गया। कुछ मंदिर अंतिम सांस ले रहे हैं तो कुछ अपने अस्तित्व की जंग लड़ रहे हैं। सरकार व प्रशासन इतिहास संजोने के प्रति उदासीन बना था। मीडिया की एक रिपोर्ट पर दुमका दौरे पर आये मुख्यमंत्री रघुवर दास ने संज्ञान लिया। मुख्यमंत्री मलूटी को लेकर काफी गंभीर हुए और मंदिरों के संरक्षण व संवर्धन को आगे आये।

वहां पीएम, यहां सीएम ने ली सुध:

जापान की मदद से वाराणसी को संवारने में जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जुटे हैं, वहीं झारखंड की काशी यानि मलूटी को मुख्यमंत्री रघुवर दास ने संजीवनी दी है। यहां अस्तित्व की जंग लड़ रहे मंदिरों के संरक्षण व संवर्धन के लिए मुख्यमंत्री ने 13.60 करोड़ रुपये दिया है। इतना ही नहीं इन मंदिरों के संरक्षण व संवर्धन के लिए इंडियन ट्रस्ट फॉर रूरल हेरिटेज एंड डेवलपमेंट ट्रस्ट, भारत सरकार के साथ झारखंड सरकार ने एमओयू किया है। ट्रस्ट के अध्यक्ष एसके मिश्र का कहना था कि बहुत जल्द मलूटी को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलेगी।

काशी और मलूटी में काफी समानता है। शुरू से ही दशासुमेध घाट के महंत वर्ष में एक बार आकर यहां पूजा पाठ कराते हैं। महंत के न आने पर उनके प्रतिनिधि आते हैं। सदियों से यह परंपरा चली आ रही है।


-स्वामी आदित्य बोथ महंत, दशासुमेध मठ, वाराणसी
Source : jagran
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