झील में तैरते है ये टापू, (देखें तस्वीरें)

दक्षिण अमरीकी देश पेरू में कुछ अनूठी प्राचीन जनजातियां आज भी पुराने दौर के तौर-तरीकों से रह रही हैं। इनमें तितिकाका झील में कृत्रिम टापू बना कर रहने वाले ‘उरू’ नामक जनजाति के लोग विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।



झील में सरकंडों के छोटे-छोटे मंच दिखाई देते हैं जो सरलता से झील पर तैरते रहते हैं। इन पर बने घरों में ही इलाके के ये मूल वासी रहते हैं। ये मंच झील में बने कृत्रिम टापुओं जैसे हैं। आज भी ये प्राचीन लोग छोटे-छोटे समुदायों में विश्व की इतनी ऊंचाई पर स्थित एकमात्र नावों में परिवहन योग्य झील में रहते हैं।




जिन पीले रंग के कृत्रिम टापुओं पर ये अपने घर बनाते हैं वे तोतोरा नामक सरकंडों से बनते हैं जो झील के किनारों पर उगते हैं। जब बरसात के दिनों में ये सरकंडों की जड़ें बह कर झील की सतह पर आ जाती हैं तो ‘उरू’ लोग इन्हें जमा कर लेते हैं। जड़ों को काट कर वे आपस में जोड़ कर नकली टापू बना लेते हैं जो 23 वर्ष तक टिके रहते हैं।




झील पर पर्यटकों को सैर करवाने वाले गाइड जोस बताते हैं कि पुरुष तोतोरा सरकंडों की जड़ों को जमा करते हैं क्योंकि उन्हें अच्छी जड़ों की पहचान होती है। इनमें ज्यादा मिट्टी लगी होने पर वे पानी में डूब जाते हैं।



अपने नकली टापुओं को तैरते रहने के लिए उपयुक्त बनाए रखने के लिए वे लोग प्रत्येक 20 दिनों में सतह पर सरकंडों की जड़ों की एक नई परत बिछाते हैं क्योंकि इतने समय में सरकंडों से बने टापू की सबसे निचली परत पानी में गलती जाती है। रस्सियों से इन टापुओं को झील के तल से बांधा जाता है ताकि वे अपने आप न बहें। साल भर के दौरान तितिकाका झील का स्तर 2 मीटर तक घटता-बढ़ता है।



इसकी वजह है कि धूप में पानी सूखता है और बोलिविया की ओर इसका पानी देसागुदेरो नदी में भी जाता है। प्रत्येक टापू पर 5 से 7 ‘उरू’ परिवार रहते हैं। वे शिकार तथा मछली पकड़ कर गुजारा करते हैं। पूनो कस्बे के बाजार में वे इन चीजों को बेच कर या इनके बदले जरूरत का अन्य सामान लेते हैं।



कपड़ों पर वे रंग-बिरंगी कशीदाकारी भी करते हैं तथा सरकंडों से हस्तकला की चीजें भी बनाते हैं जिन्हें पर्यटक खरीदते हैं। उनके मकान तथा कुछ नौकाएं भी सरकंडों से ही बनती हैं। वे सरकंडों का प्रयोग भोजन में तथा दवाई के रूप में भी करते हैं। उनके मकान एक कमरे वाले तथा आकार में आयताकार हैं। हर झोंपड़ी इतनी बड़ी होती है कि पूरा परिवार उसमें सो सके।

‘उरू’ अपनी डोंगी जैसी नौकाएं 6 महीनों में बनाते हैं। वे टिकाऊ होती हैं जिन्हें 7 वर्ष तक प्रयोग किया जा सकता है। जोस बताते हैं कि 1947 में ऐसी ही नौका में नॉर्वे के खोजी थोर हेयेरदाल ने पेरू से फ्रैंच पोलीनेशिया के बीच 4700 समुद्री मील की दूरी तय की थी।

3800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित तितिकाका झील कई तरह से विस्मित करती है। तितिकाका का अर्थ प्यूमा पत्थर होता है। किंवदंतियों के अनुसार इंका लोगों के सर्वोच्च देव ‘वीराकोचा’ (सूर्य देव) सबसे पहले यहीं आए थे। फिर उन्होंने अपने बेटे मानको कापाक को कुजको शहर की तलाश में भेजा जो 1533 में स्पेनिश उपनिवेशवादियों के हमले तक इंका साम्राज्य की राजधानी थी।

हालांकि, ‘उरू’ हमेशा से सबसे जुदा रहे। उनका अस्तित्व पेरू के ऊंचे पठारों तक पाया गया है जो इंका लोगों के उदय से पहले से मौजूद हैं। कुछ जानकारों के अनुसार ‘उरू’ लोग बोलिविया से आए थे परंतु 900 से 1200 ईस्वी के बीच पड़े अकाल के कारण वे इस झील के साथ लगते इलाके में बस गए।

शुरू में वे जमीन पर रहते थे। फिर इंका लोगों के हमलों से बचने के लिए उन्होंने ऐसे टापू बनाने का फैसला लिया जिन्हें बहा कर झील में कहीं भी ले जाया जा सके। समय के साथ उनकी मूल भाषा पुकीना लुप्त हो गई और उन्होंने तितिकाका झील के इलाके में बोली जाने वाली मूल भाषा एमारा को अपना लिया।

वर्तमान में तितिकाका के पेरू वाले हिस्से में कोई 80 ‘उरू’ टापू हैं जिन पर लगभग 1800 ‘उरू’ रहते हैं। हर टापू पर एक मुखिया होता है जबकि सभी टापुओं का एक सर्वोच्च नेता भी तय किया जाता है।

हालांकि, आज भी ‘उरू’ लोग प्राचीन ढंग से ही रहना पसंद करते हैं पेरू सरकार ने 1990 के दशक में पहली बार इन लोगों को सौर ऊर्जा के माध्यम से बिजली उपलब्ध करवाई। गत वर्ष के मध्य में वर्तमान सरकार ने उन्हें नए 600 सोलर पैनल दिए।



आमतौर पर वे अपने घरों के बाहर खुले में खाना पकाते हैं। इस दौरान वे उस स्थल के सरकंडों को गीला जरूर कर लेते हैं। बच्चे इन टापुओं पर ही खेलते हैं। हालांकि, वे स्कूल भी जाते हैं जिसके लिए उन्हें नौका से आधे घंटे की दूरी तय करनी पड़ती है।

पढ़ी-लिखी नई पीढ़ी अब इन टापुओं से दूर जाकर भी बसने लगी है। ऐसे में शायद आने वाले वक्त में ‘उरू’ लोगों का जीने का यह अनूठा तरीका विलुप्त हो जाए।
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