क्यों लगा था श्रीकृष्ण पर रणछोड़ होने का आक्षेप आरोप

मुरली मनोहर, कान्हा, कृष्ण मुरारी, नंद गोपाल, देवकी नंदन.... भक्तों ने अपने भगवान कृष्ण को नाजाने कितने ही नाम दे दिए हैं। शांत और कोमल सूरत वाले कान्हा की लीलाओं से तो सारा जग वाकिफ है।



हिन्दू धर्म

हिन्दू धर्म में कई देवताओं का जिक्र हैं, जिनके कई-कई नाम हैं। कुछ नाम उन्हें प्रेम पूर्वक मिल जाते हैं तो कुछ नामों के पीछे कोई कारण या कोई घटना छिपी होती है।

कृष्ण भगवान

आपने कृष्ण भगवान के भी कई भिन्न-भिन्न नाम सुने होंगे, आज हम आपको उनमें से एक नाम पीछे छिपी कहानी बताएंगे कि आखिर कैसे कृष्ण को वो नाम मिला।

रणछोड़ कृष्ण

कृष्ण का एक नाम है रणछोड़, सुनकर हैराने एहोती है कि जब कृष्ण की महिमा से हम सभी भली भांति अवगत हैं तो क्यों श्रीकृष्ण ने अपने शत्रु का मुकाबला ना कर मैदान छोड़ने में ही भलाई समझी?

जरासंध

यह घटना तब की है जब मगध के शासक जरासंध ने कृष्ण को युद्ध के लिए ललकारा था। परंटु उसने देखा कि कृष्ण अपने भाई बलराम के साथ रण यानि युद्ध का मैदान छोड़कर भाग रहे हैं। इस दृश्य को देखकर जरासंध हंसने लगा।

भाई बलराम

कृष्ण अपने भाई बलराम के साथ बहुत दूर तक भाग चुके थे, जिसके कारण दोनों को ही थकान महसूस होने लगी थी। आराम करने के लिए वे दोनों भाई प्रवर्शत पर्वत, जिसपर हमेशा वर्षा होती रहती थी, पर चढ़ गए।

पर्वत

जरासंध ने उन दोनों को बहुत ढूंढ़ा लेकिन दोनों में से कोई भी उनके हाथ ना लगा। तब जरासंध ने अपने सैनिकों को यह आदेश दे दिया कि वे इस पर्वत को आग लगा दें।

द्वारका नगरी

भगवान कृष्ण ने जब यह देखा कि वह पर्वत जलने लगा है तो उन्होंने अपने भाई बलराम के साथ मिलकर उस 44 कोस ऊंचे पर्वत से छलांग लगा दी और जरासंध के सैनिकों की नजरों से बचते हुए समुद्र से घिरी द्वारका नगरी में जा पहुंचे।

कृष्ण और बलराम

जरासंध को लगा कि कृष्ण और बलराम, उस आग में जलकर मर गए हैं। वह अपने आप को अत्यंत शक्तिशाली समझने लगा और इस घटन अको उसने अपनी जीत मान लिया। वह इस बात को अपनी शान मानते हुए वापस मगध लौट गया।

कूटनीतिक चाल

अब आप सोच रहे होंगे कि कृष्ण भगवान ने मैदान छोड़कर भागने के विकल्प को क्यों चुना? इसके पीछे भी उनकी एक कूटनीतिक चाल हैं।

दुश्मन का सामना

दरअसल भगवान कृष्ण यह जानते थे कि उस समय उनके शत्रु यानि जरासंध की ताकत उनसे कहीं ज्यादा थी। रणछोड़कर वे यह संदेश देना चाह रहे थे कि दुश्मन का सामना तभी करना चाहिए जब आपको अपने बल पर पूरा यकीन हो।

कई अवसर

अगर आपको लगता है आपकी ताकत उनसे कम पड़ रही है तो जान जोखिम में डालने से बेहतर वहां से भागने में ही भलाई है क्योंकि अगर जान बची रही तो आगे भी कई अवसर आएंगे।
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