जानिए हिन्दू धर्म में नदियों में क्यों करते हैं अस्थि विसर्जन?

बहुत दिनों से मन में एक बात बार-बार प्रश्न बनकर घूम रही थी। आखिरकार मृत शरीर का अंतिम संस्कार क्यों किया जाता है? मैं जिस धर्म (हिन्दू धर्म) से संबंध रखता हूं वहां शास्त्रों के अनुसार मृत शरीर को दफनाने का नहीं बल्कि जलाने का रिवाज़ है। इसलिए मन में यह सवाल आता है कि क्यों हम अंतिम संस्कार जैसी रीति को निभाते हैं?




अस्थि विसर्जन का कारण?

और यदि निभाते भी हैं तो उसके बाद शरीर की बची हुई राख को हम गंगा या अन्य किसी पवित्र नदी में क्यों बहा देते हैं? वह संबंधी जो अब इस दुनिया में नहीं रहा उसके जाने के बाद भी हमारा उसके साथ कहीं ना कहीं मोह बंधा रहता है। इसलिए कभी-कभी मन में आता है कि उनके जाने के बाद शायद उनकी जली हुई राख ही उनकी एक आखिरी निशानी है।

हम क्यों नहीं रख सकते अस्थियां?

अगर उसे भी हम नदी में बहा दें तो हमारे पास क्या बचता है? लेकिन रिवाज़ तो रिवाज़ है... जिसे हमें निभाना ही है। हमारी संस्कृति ही हमें शास्त्रीय बातों को जीवन में अमल करने का पाठ पढ़ाती है। लेकिन अपने इस प्रश्न का जवाब खोजते हुए अचानक मैं एक कहानी पर आकर रुक गया।

एक कहानी


जवाब की चाह में मेरा परिचय एक ऐसी कहानी से हुआ, जिसने मेरे लिए अंधेरे में एक दीपक का काम किया। यह कहानी अति प्राचीन काल के एक ऐसे व्यक्ति की है जो काफी निर्दयी था। उसने जीवन भर ना तो कोई अच्छा कार्य किया था और ना ही वह करना चाहता था।
वह अपने परिवार वालों के साथ अन्य कई लोगों को परेशान करता। उसके जीवन में शायद पुण्य नामावली का कोई अर्थ ही नहीं था, इसलिए वह केवल पाप ही कमाता था। एक दिन अचानक वह पास के एक जंगल में गया जहां एक बाघ का शिकार बन गया।
उसके मरने के तुरंत बाद ही यमराज के कुछ सेवक उसकी आत्मा को लेने वहां पहुंच गए और सीधे यमलोक ले गए। अब वहां कुछ बचा था तो उसका मृत शरीर जिसे काफी हद तक तो बाघ ही खा गया लेकिन बचा हुआ कुछ हिस्सा अन्य छोटे जानवरों का भोजन बना।
इसी बीच कुछ उड़ने वाले जीव भी भोजन की तलाश में उस मृत शरीर के पास पहुंचे। अचानक एक जीव हड्डी के एक टुकड़े को अन्य जीवों से छिपाता हुआ आकाश में उड़ गया, लेकिन उसके ठीक पीछे दूसरा जीव भागा और दोनों में उस हड्डी के एक टुकड़े को हासिल करने का संघर्ष होने लगा।
इसी बीच यमलोक का दृश्य कुछ और ही था। वहां यमराज के सेवक चित्रगुप्त द्वारा उस व्यक्ति के पापों का हिसाब लगाया जा रहा था। चित्रगुप्त एक-एक करके यमराज को व्यक्ति के पापों का ब्योरा दे रहे थे, जिसके आधार पर उसे विभिन्न नर्क हासिल होने की आशंका जताई जा रही थी।

तभी अचानक धरती लोक पर जहां उस व्यक्ति के मृत शरीर की हड्डी के लिए वह दो जीव लड़ रहे थे, अचानक उनके मुंह से वह हड्डी गिर गई और सीधा गंगा नदी में जाकर गिरी। गंगा नदी में हड्डी के पवित्र होते ही उस इंसान के सारे पाप धुल गए।
और उसे मिलने वाले नर्क की सज़ा माफ कर दी गई। गंगा नदी जो कि भगवान शिव की जटाओं से निकलकर धरती लोक पर आई हैं, उनकी पवित्रता शिवजी के नाम से जुड़ने से ही बन जाती है। इसलिए धरती लोक में सबसे पूजनीय नदी ही गंगा है, जिसमें स्नान करने से ही सभी पाप मुक्त हो जाते हैं ऐसी मान्यता बनी हुई है।

गंगा नदी की पवित्रता


वैसे केवल कहानी ही नहीं, साथ ही हिन्दू धर्म के कुछ महान ग्रंथों में भी अस्थि विसर्जन के आख्यान पाए गए हैं। शंख स्मृति एवं कर्म पुराण में गंगा नदी में ही क्यों अस्थि विसर्जन करना शुभ है, इसके तथ्य पाए गए हैं। इस नदी की पवित्रता को दर्शाते हुए ही वर्षों से अस्थियों को इसमें विसर्जित करने की महत्ता बनी हुई है।

अन्य नदियां भी


हिन्दू धर्म के अलावा सिख धर्म में ही अस्थि विसर्जन किया जाता है, लेकिन ऐसा जरूरी नहीं कि वह गंगा नदी में ही हो। परन्तु मान्यतानुसार एक पवित्र नदी का ही इसके लिए चुनाव किया जाता है। लेकिन शास्त्रों में खासतौर पर अस्थि विसर्जन को गंगा नदी से जोड़कर ही देखा गया है।

हरिद्वार और प्रयाग


हिन्दू धार्मिक स्थल जैसे कि हरिद्वार, प्रयाग आदि में गंगा का वास है जहां एक बड़े स्तर पर विधि-विधान से अस्थि विसर्जन किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि मनुष्य की अस्थियां वर्षों तक गंगा नदी में ही रहती हैं। गंगा नदी धीरे-धीरे उन अस्थियों के माध्यम से इंसान के पाप को खत्म करती है और उससे जुड़ी आत्मा के लिए नया मार्ग खोलती है।

क्या है वैज्ञानिक रूप?

इंसान की अस्थियों एवं नदी को वैज्ञानिक रूप से भी जोड़कर देखा जाता है। कहते हैं कि नदी में प्रवाहित मनुष्य की अस्थियां समय-समय पर अपना आकार बदलती रहती हैं जो कहीं ना कहीं उस नदी से जुड़े स्थान को उपजाऊ बनाती हैं।

अस्थियां और प्रकृति

जिस भी धरातल को नदी का पानी छूता है वह स्थान उपजाऊ बन जाता है। इसका यह अर्थ है कि मरने के बाद भी इंसान की अस्थियां प्रकृति को एक नया जीवन देने के लिए लाभकारी सिद्ध होती हैं।
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