एक सेवानिवृत्त पोस्टमास्टर ने उसकी बेगम की याद में बनवाया ताजमहल...

मुगल वंश के बादशाह शाहजहां ने अपनी पसंदीदा बेगम की मुमताज महल की याद में ताज महल बनवाया था. शाहजहां तो इस देश का शासक हुआ करता था, तो जाहिर है कि शाहजहां के लिए उसके प्यार की प्रदर्शनी कोई बहुत बड़ी बात नहीं होगी. 





मगर ताज महल बनने के 350 साल बाद बुलंदशहर के एक सेवानिवृत्त पोस्टमास्टर ने उसकी बेगम की याद में ताजमहल की प्रतिकृति तैयार करवाई है. फैज़ुल हसन कादरी नामक इस शख़्स की उम्र 80 वर्ष है, और उनकी मरहूम बेगम का नाम ताजम्मुली बेगम है.

फैज़ुल हसन कादरी केसर कलां बेगम गांव के बासिंदे हैं, जो बुलन्दशहर जिला हेडक्वार्टर से 50 कि.मी की दूरी पर स्थित है. फैज़ुल की शादी सन् 1953 में हुई थी.



फैज़ुल की शादी के 58 वर्ष बाद सन् 2011 में उनकी पत्नी गले के कैंसर से चल बसीं. यह शख़्स जो उसकी पत्नी से बेइंतहा मोहब्बत करता था ने यह ठान लिया कि वह उसकी पत्नी की याद में कुछ यादगार बनवाएगा. उसने उसके पास सहेज कर रखे गए थोड़े-बहुत धन के दम पर उसके गांव में वास्तविक ताज महल की एक प्रतिकृति बनाने की ठान ली.

फैज़ुल ने उसकी पत्नी के इंतकाल के तुरंत बाद ही इस इमारत पर काम करना-करवाना शुरु कर दिया. मगर जल्द ही उसके पास पैसे चुकने लगे. इसके बाद उसने उसके हिस्से के ज़मीन के टुकड़े को बेच दिया, जिससे उसे 6 लाख रुपये मिले, और उसके पत्नी के जेवर भी जिससे उसे 1.5 लाख रुपये मिले. अब तक वह 11 लाख रुपये खर्च कर चुका है, मगर अब उसके पास धन नहीं है और उसे इस इमारत को पूरा कराने हेतु और इसके आस-पास हरे-भरे पार्क के निर्माण में कम-से-कम और 6 लाख रुपयों की ज़रूरत है.




इस पूरे मुहिम में दिलचस्प मोड़ तब आया जब यह ख़बर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री तक पहुंची, और उन्होंने इस ख़बर का संज्ञान लेते हुए फैज़ुल नामक इस शख़्स को जिलाधिकारी के मार्फ़त बुलावा भेजा है. साथ ही इस इमारत को पूरा कराने हेतु धनराशि का आश्वासन भी दिया है. हालांकि फैज़ुल ने ऐसी कोई भी मदद लेने से इंकार कर दिया है.

फैज़ुल कहते हैं कि वे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मिलने तो ज़रूर जाएंगे, लेकिन वह इस इमारत के लिए मदद के बजाय उनके गांव के स्कूल को सरकारी मान्यता दिलाने की अपील करेंगे.

फैज़ुल कादरी का यह अर्धनिर्मित ताज महल पहले ही लोगों के बीच उत्सुकता का केन्द्र बन गया है. यहां आस-पास रहने वाले लोग इसे देखने के लिए अक्सर यहां तक आते हैं.

फैज़ुल उनकी पत्नी की बीमारी पर कहते हैं कि पहले-पहल वे अपनी पत्नी को कान की परेशानी पर लेकर डॉक्टर के पास गएं, मगर वहां डॉक्टर ऐसी किसी बीमारी का पता नहीं लगा सके. लेकिन बाद में जब वे अलीगढ़ मेडिकल कॉलेज गए तो उन्हें पता चला कि उसे गले का कैंसर है. और वह इस हालत व उम्र में नहीं हैं कि वे कीमोथेरेपी के असर को सह सकें. उसके बाद वे अपनी पत्नी को लेकर वापस लौटे जहां उनकी मौत गांव के बाहर उनके द्वारा बनाए गए एक छोटे घर में हो गई.



फैज़ुल कहते हैं कि जो भी इस दुनिया में आया है, उसका इस दुनिया से जाना मुकर्रर है. वे भी एक दिन इस दुनिया से चले जाएंगे. उनके द्वारा बनवायी गई यह इमारत भी हमेशा नहीं रहेगी. मगर उन्होंने उनके भाई से यह वादा लिया है कि वे उन्हें यहीं दफना दें. और वे उनकी ज़िंदगी के ख़त्म होने से पहले इस बेमिसाल इमारत को पूरा होते देखना चाहते हैं.
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