तोप और गोलें भी थे बेअसर 800 फीट की ऊंचाई पर बने इस किले पर...

कोशिश बहुत की गई। तोपों के बड़े-बड़े गोले बरसाए गए, लेकिन चंदेल राजाओं से बांदा के कालिंजर की सल्तनत कोई नहीं छीन पाया। ऐतिहासिक कालिंजर फोर्ट आज भी सीना तान के खड़ा है। इसे देश का सबसे बड़ा दुर्ग होने का गौरव प्राप्त है। विंध्याचल की पहाड़ी पर करीब 800 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस किले पर कई सौ सालों तक चंदेल के राजाओं ने शासन किया था।


बुंदेलखंड के बांदा जिले से करीब 55 किमी दूर कालिंजर में बना ये फोर्ट कई किलोमीटर तक फैला हुआ है। इसमें घूमने में करीब दो दिन लग जाता है। बाहर से देखने पर ये किला एक पहाड़ लगता है, लेकिन ऊपर जाने पर इसकी विशालता हैरान कर देती है। काफी कोशिशों के बाद भी मुगल इस किले को चंदेल राजाओं से छीन नहीं पाए थे।

1. हर युग में इस किले के थे अलग नाम
इस फोर्ट पर लंबे समय तक चंदेल शासकों का राज रहा। इसका निर्माण कब हुआ, इसके प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिलते हैं। कालिंजर को सतयुग का हिस्सा बताया जाता है। इसे अलग-अलग काल में कई नामों से पुकारा जाता रहा है। सतयुग में इसे कीर्तिनगर, त्रेतायुग में मध्यगढ़ और द्वापर युग में सिंहलगढ़ के नाम से जाना जाता था। वहीं, कलयुग में इसे कालिंजर के नाम से पुकारा जाता है।





2. महादेव ने यहीं पर विष पीकर प्राप्त की थी शांति
कहा जाता है कि यहां भगवान शिव ने कालकूट विष पीकर शांति प्राप्त की। इसके साथ ही अनेक पौराणिक और ऐतिहासिक प्रसंग कालिंजर फोर्ट से जुड़े हैं। 9वीं शताब्दी में ये किला चंदेल साम्राज्य के अधीन हो गया। यहीं से कालिंजर का ऐतिहासिक काल शुरू हुआ। 15वीं शताब्दी तक इस किले पर चंदेल राजाओं का शासन रहा। माना जाता है कि कालिंजर में चंदेल राजाओं ने सबसे ज्यादा 600 साल तक शासन किया। विंध्याचल की पहाड़ी पर 800 फीट की ऊंचाई पर स्थित ये किला इतिहास के उतार-चढ़ावों का प्रत्यक्ष गवाह है।





3. इस किले में छिपे हैं कई रहस्य
स्थानीय निवासी शैलेंद्र श्रीवास्तव बताते हैं कि किले में कई रहस्य हैं। इन्हें सैकड़ों सालों में भी खोजा नहीं जा सका है। ये किला आज भी लोगों के लिए उत्सुकता और आकर्षण का केंद्र रहा है।



4. मुगलों ने किया आक्रमण, फिर भी नहीं जीत पाए कालिंजर
चंदेल राजाओं के शासन काल में मुगलों ने कालिंजर को जीतने के काफी प्रयास किए। महमूद गजनवी, कुतुबुद्दीन ऐबक, शेर शाह शूरी और हुमायूं ने इस पर आक्रमण किया, लेकिन नाकामयाबी हाथ लगी। 22 मई, 1545 में शेर शाह सूरी ने इस किले को जीतने के लिए तोप का गोला फेंका, लेकिन वो गोला किले की मजबूत दीवारों से टकराकर वापस शेर शाह पर गिर गया। इससे शेर शाह सूरी की मौत हो गई।


800 फीट की ऊंचाई पर बना है कालिंजर फोर्ट।



5. अकबर ने बीरबल को भेंट किया था किला
अकबर ने 1569 में ये किला जीत तो लिया, लेकिन इसे उन्होंने बीरबल को भेंट कर दिया। इतिहासकारों के अनुसार, बीरबल के बाद ये किला राजा छत्रसाल के अधीन हो गया। छत्रसाल के बाद इस पर पन्ना के राजा हरदेव शाह ने शासन किया। 1800 के बाद ये फोर्ट अंग्रेजों ने अपने नियंत्रण में ले लिया।


6. कुछ समय पहले मिले थे कई प्राचीन शिलालेख

कालिंजर विकास संस्थान के संयोजक बीडी गुप्ता ने बताया कि कुछ समय पहले यहां कई प्राचीन शिलालेख मिले थे। इन शिलालेखों के बारे में उन्होंने बताया कि मई, 1545 को शेर शाह की मृत्यु के बाद उनके बेटे इस्लाम शाह की दिल्ली के सिंहासन पर विधिवत ताजपोशी हुई थी। इसके बाद यहां किले के अंदर बने कोटि तीर्थ परिसर के मंदिरों को तोड़कर उनके सुंदर नक्काशीदार स्तंभों को मस्जिद बनाए जाने में इस्तेमाल किया गया था।


7. इस्लाम शाह ने यहीं सुनाया था शाही फरमान


मस्जिद के बगल में खुत्बा (संबोधन) पढ़ने के लिए एक प्लेटफॉर्म बनाया गया था। इसी में बैठकर इस्लाम शाह ने ये शाही फरमान सुनाया था। साथ ही घोषणा की थी कि अब ये कालिंजर तीर्थ नहीं रहेगा। बुतपरस्ती हमेशा के लिए खत्म। 

कालिंजर दुर्ग को शेर शाह की याद में शेर कोह के नाम से जाना जाएगा। बीडी गुप्ता ने बताया कि कालिंजर के यशस्वी राजा और रानी दुर्गावती के पिता कीर्ति सिंह समेत उनके 72 सहयोगियों की हत्या इस्लाम शाह ने की थी।


8. कभी इस किले में थे चार प्रवेश द्वार



एक समय था, जब कालिंजर चारों ओर से ऊंची दीवार से घिरा था और इसमें चार प्रवेश द्वार थे। इस वक्त कामता द्वार, पन्ना द्वार और रीवा द्वार नाम के सिर्फ तीन गेट ही बचे हैं। 

किले में आलमगीर दरवाजा, गणेश द्वार, चौबुरजी दरवाजा, बुद्ध भद्र दरवाजा, हनुमान द्वार, लाल दरवाजा और बारा दरवाजा नाम के सात द्वारों से अंदर जा सकते हैं। किले के अंदर राजा और रानी के नाम से शानदार महल बने हुए हैं।


9. सीता का विश्राम स्थल भी है यहां




कालिंजर फोर्ट के अंदर ही पाषाण द्वारा निर्मित एक शैय्या (बेड) और तकिया (पिलो) है। इसे सीता सेज कहते हैं। कथाओं के अनुसार, इसे सीता का विश्राम स्थल कहा जाता है। 

यहां पर तीर्थ यात्रियों के आलेख हैं। एक जलकुंड है, जो सीताकुंड कहलाता है। इस दुर्ग में दो बड़े जलकुंड बने हुए हैं। इसका जल चर्म रोगों को दूर करने के लिए लाभकारी माना जाता है। यहां नहाने से कुष्टरोग दूर हो जाता है।

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